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Homeभक्ति51 शक्तिपीठों में से एक है गुजरात स्थित मां अम्बा का ये सुप्रसिद्ध मंदिर

51 शक्तिपीठों में से एक है गुजरात स्थित मां अम्बा का ये सुप्रसिद्ध मंदिर

Ambaji Shaktipith
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भारत और उसके उपमहाद्वीपों में करीब 51 शक्तिपीठ मौजूद है जबकि तंत्रचूड़ामणि के मुताबिक शक्तिपीठों की संख्या 108 है। आज हम इन्ही में से एक और शक्तिपीठ की बात करेंगे और जानेंगे, यहां का महत्व और मान्यताएं, क्योंकि आदिकाल से चला आ रहा है सृष्टि शक्ति से ही चलायमान है और इन्ही शक्ति केन्द्रों की वजह से सृष्टी टिकी हुई है।  

गुजरात-राजस्थान सीमा पर स्थित बनासकांठा जिला , जहां मां शक्ति अम्बाजी के नाम से विराजती है। माता का ये मंदिर बेहद प्राचीन है। मान्यतानुसार यह माना जाता है कि इस स्थान पर देवी सती का ‘उदर भाग’ गिरा था। मां अम्बा-भवानी के शक्तिपीठों में से एक इस मंदिर के प्रति मां के भक्तों में अपार श्रद्धा है। लाखों भक्त माता के दर्शन के लिए यहां आते रहते है। वैसे तो ये स्थान काफी खास है लेकिन यहां जो सबसे खास है वो इस मंदिर का गर्भगृह, जहां मां की कोई प्रतिमा नहीं है बल्कि यहां मां का एक श्रीयंत्र स्थापित किया गया है जिसे इस प्रकार से सजाया जाता है कि देखनेवाले को लगे कि मां अम्बे यहां साक्षात विराजती है। अम्बाजी मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां पर भगवान श्रीकृष्ण का मुंडन संस्कार संपन्न हुआ था। वहीं भगवान राम भी शक्ति की उपासना के लिए यहां आ चुके हैं, जिस वजह से भी इस स्थान की महिमा और बढ़ जाती है।

देखें ये वीडियो: मां अम्बा-भवानी के शक्तिपीठों में से एक इस मंदिर के प्रति मां के भक्तों में अपार श्रद्धा है

मां अम्बाजी मंदिर गुजरात-राजस्थान सीमा पर स्थित है। माना जाता है कि यह मंदिर लगभग बारह सौ साल पुराना है। बताया जाता है कि इस मंदिर के जीर्णोद्धार का काम 1975 से शुरू हुआ था और तब से अब तक जारी है। श्वेत संगमरमर से निर्मित यह मंदिर बेहद भव्य है। मंदिर का शिखर एक सौ तीन फुट ऊंचा है,औऱ शिखर पर 358 स्वर्ण कलश सुसज्जित हैं।

यहां की एक खास बात ये भी है कि मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर गब्बर नामक पहाड़ है। इस पहाड़ पर भी देवी मां का प्राचीन मंदिर स्थापित है। माना जाता है यहां एक पत्थर पर कुछ पदचिन्ह बने हुए है जो कि मां के पदचिन्ह है। पदचिह्नों के साथ-साथ मां के रथचिह्न भी बने हैं। परंपरा है कि अम्बाजी के दर्शन के बाद भक्त यहां जरूर आते है। हर साल भाद्रपदी पूर्णिमा के मौके पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु जमा होते हैं। प्रत्येक माह पूर्णिमा और अष्टमी तिथि पर यहां मां की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

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यहां माता की पूजा भी हर सप्ताह अलग अलग तरह की जाती है जिसमें सबसे खास होती है अलग-अलग सवारी। यहां रविवार को मां बाघ पर सवार दिखाई देती है तो सोमवार को नंदी पर तो मंगलवार को शेर पर। बुधवार को ऐरावत पर , तो गुरूवार को गरुड़ पर , शुक्रवार को हंस पर तो शनिवार को मां हाथी पर सवारी करते दृश्यमान दिखाई देती है।

नवरात्रि में यहां का वातावरण आकर्षक और शक्तिमय होता है। नौ दिनों तक चलनेवाले इस पर्व में बड़ी संख्या में भक्त यहां माता के दर्शन के लिए पहुंचते है। इस मौके पर मंदिर प्रांगण में गरबा करके शक्ति की आराधना की जाती है। समूचे गुजरात से कृषक अपने परिवार के सदस्यों के साथ मां के दर्शन के लिए एकत्रित होते हैं। बड़े स्तर पर मनाए जाने वाले इस समारोह में ‘भवई’ और ‘गरबा’ जैसे नृत्यों का प्रबंध किया जाता है। साथ ही यहां पर ‘सप्तशती’ (मां की सात सौ स्तुतियां) का पाठ भी आयोजित किया जाता है।

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