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जानिए अष्टभुजा देवी को नंदा और योगमाया क्यों कहा जाता है

Ashtabhuja Devi
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मां विंध्यवासिनी देवी का वास स्थान है विंध्याचल। पतित पावनी गंगा के पास स्थित यह पवित्र स्थान देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक है। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में स्थित इस क्षेत्र में सालों भर भक्तों की भीड़ रहती है। यहां की सबसे खास बात यह है कि तीन किलोमीटर के अंदर माता के तीन रूप के दर्शन होते हैं। मध्य में हैं मां विध्यवासिनी, कालीखोह पहाड़ी पर हैं महाकाली और अष्टभुजा पहाड़ी पर साक्षात अष्टभुजा देवी विराजमान हैं। अष्टभुजा देवी की प्रतिमा एक लंबी और अंधेरी गुफा में है। गुफा तक पहुचने के लिए आपको 160 पत्थर की सीढ़ियों को चढ़ना होगा।  गुफा के अंदर हमेशा दीप जलता रहता है जिसकी रोशनी में भक्त माता के दर्शन करते हैं।

अष्टभूजा देवी की अवतरण कथा

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार दुर्गासप्तशती के ग्यारहवें अध्याय में मां भगवती उदघोष करती हैं कि जब शुंभ-निशुंभ नामक महादैत्य उत्पन्न होंगे, तब मैं नंदगोप के घर माता यशोदा के गर्भ से जन्म लूंगी और विंध्याचल जाउंगी और उन दैत्यों का संहार करूंगी।  श्रीमद्भगवत गीता में भी माता अष्टपूजा देवी के अवतरण की कथा का उल्लेख है।

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गीता में कहा गया है कि देवकी के आठवें गर्भ से जन्म लिए भगवान श्रीकृष्ण को वसुदेव जी ने कंस के भय से रातोंरात यमुना नदी पार कर नंद के घर पहुंचाया और वहां से यशोदा के गर्भ से जन्मी माता को मथुरा ले आएं। जब कंस को आठवीं संतान के जन्म की सूचना मिली, तो वो भागकर कारागार पहुंचा और जैसे ही कन्या को पत्थर पर पटकर मारना चाहा, तब कंस के हाथों छूट दिव्य रूप धारण करते हुए माता ने कंस वध की भविष्यवाणी कर विंध्याचल लौट आईं। नंद के घर जन्म लेने के कारण उन्हें नंदा और योगमाया भी कहा जाता है।

अष्टभुजा मंदिर से गंगा मां के दर्शन

अष्टभुजा मंदिर से आप मां गंगा के भी दर्शन कर सकते हैं। गंगा नदी पहाड़ी की तलहटी से होकर बहती हैं। यहां से देखने से ऐसा लगता है कि गंगा के दोनों और से कुछ जलधाराएं आकर गंगा में समा रही हैं। यह अलौकिक दृश्य है।

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मान्यता

ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन काल में यह राजाओं का पसन्दीदा स्थान था। जो शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने और अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिये तान्त्रिकों की मदद से गुप्त पूजाओं, यज्ञों और अनुष्ठानों के लिये यहाँ आते थे। आज भी तंत्र साधना के लिए लोग विंध्याचल आते हैं और मां अष्टभुजादेवी की आराधना करते हैं।

नवरात्री उत्सव

हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विनी और चैंत्र मासों में नौ दिवसों तक नवरात्री उत्सव मनाया जाता है। माता के नौ रूपों की पूजा की जाती है। विन्धयाचल में नवरात्री के अवसर पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। वैसे यहां भक्तगण पूर्णिमा के दिन भी बड़ी संख्या में आते हैं। ज्येष्ठ एकादशी के दिन मंदिर में स्थानीय लोक गीत कजली गाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस गीत से देवी मां प्रसन्न होती हैं।

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