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गोहिलवाड़ की चारों दिशाओं में मां भवानी हैं विराजमान, जानिए पौराणिक गाथा!

bhavani mandir
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Bhavani Temple: गोहिलवाड़ के राजा प्रजा के हितकारी थे। प्रजा की समस्याओं का निवारण करते थे। राजा धार्मिक थे, समग्र राज्य भी भक्ति-भाव में लीन रहता था। शासक मां भवानी और शिवजी के परम भक्त थे, मां की भक्ति में अटूट श्रद्धा रखते थे। उनकी अपार श्रद्धा-भक्ति का साक्षी है भवानी मंदिर का प्राचीन इतिहास। 

गोहिलवाड़ की चारों दिशाओं में मां भवानी विराजमान हैं:-

आज गोहिलवाड़ की चारों दिशाओं में मां भवानी विराजमान हैं। जानेंगें भावनगर के महुआ जिले में समुद्र  किनारे स्थित मां भवानी  की पौराणिक गाथा जगत जननी मां भवानी मंदिर का इतिहास लगभग पांच हजार वर्ष पुराना है। ऐसा माना जाता है कि यादवों के द्वारका आने के पहले से मंदिर स्थापित हैं। इस पवित्र भूमि पर लोथल संस्कृति के अवशेष भी मौजूद हैं। भवानी मंदिर का इतिहास इस बात की पुष्टि करता है कि वर्तमान में कथपर गांव एक समय सुंदर राज्य हुआ करता था। उल्लेखित है कि राज्य को विभिन्न नाम से जाना गया इतिहासकारों द्वारा पुराणों में विविध नामों से वर्णन किया गया है। 

कृष्ण और रुक्मणी के प्रेम का साक्षी है: Bhavani Temple

इस जगह को कुंदनपुर नगरी और कनकपुर नगरी के नाम से जाना जाता था। कुंदनपुर राज्य की राजकुमारी देवी रुक्मणी  थी। वे मां भवानी की परम भक्त थी। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण जब मां भवानी के दर्शन के पश्चात और समुद्र किनारे विहार भ्रमण के लिए निकले। उस समय रुक्मणी मां भवानी के स्मरण में स्तुति कर रही थी। 

उसी क्षण श्री कृष्ण की नजर मां की भक्ति में लीन रुकमणी पर पड़ी, इसके पश्चात राजकुमारी की नजर कृष्ण पर पड़ी। दोनों को एक दूसरे से प्रेम हो गया। ऐसा माना जाता है कि भवानी मंदिर श्री कृष्ण और रुकमणीजी के प्रेम का साक्षी है।  

आज भी मंदिर के विशाल प्रवेश द्वार पर कुंदनपुर नाम लिखा गया है। अरब सागर के किनारे विराजित मां भवानी के दिव्य स्वरूप दर्शन मात्र से भक्तजन मंत्र मुग्ध हो जाते हैं। मंदिर में आद्यशक्ति मां भवानी की श्रंगारित मनोरम मूर्ति स्थापित है। 

भक्तों की मान्यता पूर्ण होते ही छत्तर भेंट में चढ़ाई जाती है:- 

भक्तों की मान्यता पूर्ण होते ही छत्तर भेंट में चढ़ाई जाती है। भेंट में चढ़ाई गई अनेकों छत्तर हारमाला के समान नजर आती है। रोचक इतिहास के कारण मां भवानी मंदिर भक्तों की आस्था का केंद्र है। इसलिए गोहीलवाण के अलावा अन्य राज्यों से भी लोग दर्शन करने आते हैं। 

यहां पढ़ें: गुजरात के इस प्रसिद्ध मंदिर के गर्भगृह में शक्तिपीठ अम्बा हैं स्वयं विराजमान!

वार त्योहार और खास करके चैत्र माह दरमियान महाआरती में शामिल होने के लिए भक्तज बड़ी संख्या में उमड़ते हैं। मां भवानी का वाहन शेर है इसलिए मंदिर में शेर की आश्चर्यचकित प्रतिमा भी स्थापित है। मंदिर में प्राचीन शिवलिंग भी स्थापति है। एक ओर मंदिर में घंटनाद सुनाई देता है दूसरी ओर अरब सागर की लहरों की सुरम्य आवाज सुनाई देती है। उस दौरान श्रद्धालु मंदिर में हो रही आरती का अलौकिक आनंद का लुप्त लेते हैं। भक्तजन सच्ची श्रद्धा भक्ति से आरती में शामिल होना मां का प्रसाद समझते हैं।   

प्रकृति के सानिध्य में  विराजित मां भवानी की आराधना करने के लिए सामान्य दिनों में भी भक्तजन दर्शन के लिए आते रहते हैं। 

आस्था का प्रतीक मां भवानी की मूर्ति और लहराती सफेद ध्वजा के दर्शन मात्र से ही भक्तों के सभी दु:ख दर्द दूर होते हैं। ऐसा माना जाता है मां भवानी भावनगर के निवासियों की रक्षा करती हैं इसलिए माता के मंदिर से लोगों की अटूट आस्था जुड़ी हुई है। आप भी आयें मां की चौखट पर हो जाएँ मां भवानी की भक्ति में लीन। 

देखें यह वीडियो: भवानी मंदिर का  रोचक इतिहास 

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