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Homeभक्तिमाता सती की दायीं भुजा के निपात से स्थापित हुआ ये शक्तिपीठ

माता सती की दायीं भुजा के निपात से स्थापित हुआ ये शक्तिपीठ

Chattal Bhavani
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बांग्लादेश का एक जिला है चिट्टागौंग, जहां से 38 किलोमीटर दूर स्थित है सीताकुंड स्टेशन. यहां से 350 मीटर की ऊंचाई पर चंद्रनाथ पर्वत के शिखर पर स्थित है चट्टल भवानी शक्तिपीठ. दरअसल देवी भागवत पुराण में 108, कालिकापुराण में 26, शिवचरित्र में 51, दुर्गा शप्तसती और तंत्रचूड़ामणि में शक्ति पीठों की संख्या 52 बताई गई है. साधारत: 51 शक्ति पीठ माने जाते हैं. तंत्रचूड़ामणि में लगभग 52 शक्ति पीठों के बारे में बताया गया है. इनमें से एक है देवी का ये धाम, जहां शक्ति स्वंय निवास करती है. देवी का ये धाम हिंदू श्रद्धालुओं के लिए काफी खास है क्योंकि शक्तिपीठ होने की वजह से दूर दूर से भक्त यहां देवी के धाम आते है.

पौराणिक मान्यता !

पहले ये जानते है चट्टल भवानी देवी के इस शक्ति पीठ की उत्पत्ति कैसे हुई. श्रीमद भागवत कथा और शिवमहापुराण के मुताबिक भगवान शिव की पत्नि औऱ राजा दक्ष की पुत्री देवी सती अपने पिता द्वारा आयोजित एक विराट यज्ञ में पहुंची, लेकिन इर्ष्यावश राजा दक्ष ने इस यज्ञ में अपने दामाद भगवान शिव और पुत्री को यज्ञ में शामिल होने का निमंत्रण नहीं भेजा था. फिर भी सती अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गई, लेकिन दक्ष ने पुत्री के आने पर उपेक्षा का भाव प्रकट किया और भगवान शिव के विषय में सती के सामने ही अपमानजानक बातें कही, जिसे सुनना सती के लिए पीड़ादायी और घोर अपमानजनक था.

देखें ये वीडियो: माता सती की दायीं भुजा के निपात से स्थापित हुआ ये शक्तिपीठ

इसे वो बर्दाशत नहीं कर पाई और इस कुंठावश उन्होंने वहीं यज्ञ कुंड में कूद अपने प्राण त्याग दिए. इस बात की जानकारी जब भगवान शिव को हुई तो वे काफी दुखी हुए क्योंकि शिव पहले से ही ये सब जानते थे. माता सती के शोक में भगवान शिव,  सती का शरीर का जलता हुआ शरीर लेकर तांडव नृत्य करने लगे. भगवान शिव की इस दशा को देखकर तीनों लोक व्याकुल हो गए जिसके बाद माता सती के प्रति भगवान शिव का मोह भंग करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर के 51 भाग किए थे. जिस-जिस जगह पर माता सती के शरीर के अंग गिरे, वे शक्तिपीठ कहलाए.  माना जाता है इस स्थान पर माता सती की दायीं भुजा गिरी थी, जिस वजह से ये शक्तिपीठ अस्तित्व में आया.

इस स्थान की शक्ति ‘भवानी’ है और भैरव को ‘चंद्रशेखर’ कहते हैं. यहां चंद्रशेखर शिव का भी मंदिर है. यहीं पर पास में ही सीताकुण्ड, व्यासकुण्ड, सूर्यकुण्ड, ब्रह्मकुण्ड, बाड़व कुण्ड, लवणाक्ष तीर्थ, सहस्त्रधारा, जनकोटि शिव भी हैं. खास बात ये है कि यहां बाडव कुण्ड से निरंतर आग निकलती रहती है.

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शिवरात्री पर लगता है भव्य मेला !

नवरात्रि के त्यौहार के समय देवी मंदिर में विशाल मेले का आयोजन किया जाता है. इस मेले में बड़ी संख्या में भक्त लोग मंदिर पर पूजा-अर्चना करने के लिए आते है. इस सिध्पीठ में साल भर भक्त एवं श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए आते है. चट्टल भवानी देवी मंदिर में सभी त्यौहार मनाये जाते है. यहां सिर्फ नवरात्रि ही नहीं बल्कि महाशिवरात्री के समय भी खास और विशेष मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें शिव और शक्ति के भक्त आते है और देवी के दर्शन कर कृपा प्राप्त करते है. यह मंदिर भक्तों की अटूट आस्था का केन्द्र है. कहा जाता है कि यहां आने वाले सभी भक्तों की मनोकामनायें पूर्ण होती हैं.

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