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धार्मिक और स्वास्थ्य की दृष्टि से श्रीफल अत्यंत शुभ और पौष्टिक माना जाता है!

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प्रकृति मनुष्य की सहचरी है,  प्रकृति के पंचमहाभूत ही मनुष्य का पालन पोषण करते हैं, इसीलिए भारतीय संस्कृति में प्रकृति की पूजा,  हर त्योहार , समारोह पर करने का विधान है।  प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त होता रहे, उसका संरक्षण होता रहे, इस दृष्टि से प्रकृति में ईश्वर तत्व की स्थापना की गई। लेकिन हर मान्यता और परंपरा के पीछे जहां पौराणिक मान्यताएं हैं  वहीं उनका आधार हमेशा विज्ञान और सृष्टि कल्याण ही रहा है।   

आज हम आपको प्रकृति के एक ऐसे ही अमृत तत्व की बात बताते हैं, जिसे नारीकेलम , नारियल, श्रीफल आदि नामों से जाना जाता है।

 पौराणिक महत्त्व: नारियल से संबंधित दो कथाएं प्रचलित (Mythological beliefs)

image credit: mythnosis

पौराणिक मान्यता के अनुसार नारियल से संबंधित दो कथाएं प्रचलित हैं।  जिसमें एक कथा है, राजा पृथु के पुत्र सत्यव्रत से संबंधित।  जिन्होंने अपने जीवन के अंतिम चरण में अपने पुत्र राजा हरिश्चंद्र को अपना राज-पाट सौंप दिया और ईश्वर सेवा के उद्देश्य से महर्षि विश्वामित्र के आश्रम में जा पहुंचे। विश्वामित्र तपस्या करने गए थे । इस दौरान उन्होंने ऋषि के आश्रम में रहकर सामान्य व्यक्ति की तरह आश्रमवासियों, और  पशुओं की सेवा की। ऋषि विश्वामित्र के लौटने पर जब उन्हें यह  पता चला तो वे  बहुत खुश हुए और सत्यव्रत से वरदान मांगने को कहा। सत्यव्रत की इच्छा के अनुसार उन्होंने उसे स्वर्ग भेजने का रास्ता बना दिया,  लेकिन स्वर्ग के देवता इंद्र ने उन्हें धक्का दे दिया क्योंकि स्वर्ग के नियम के अनुसार कोई भी मनुष्य जीते जी सशरीर स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर सकता । विश्वामित्र ने अपनी शक्ति से धरती और आकाश के बीच स्वर्ग निर्मित किया , जिसे आधार देने के लिए एक स्तम्भ लगाया गया,  यही स्तंभ कालांतर में नारियल का पेड़ बना । यही कारण है कि नारियल को स्वर्ग फल भी कहा जाता है।

दूसरी कथा के अनुसार  भगवान विष्णु ने जब पृथ्वी पर अवतार लिया तो वे स्वर्ग से अपने साथ लक्ष्मी जी,  कामधेनु और श्रीफल लेकर आए थे।  श्रीफल के ऊपर तीन आंखों जैसे छेद ब्रह्मा , विष्णु और महेश का रूप माने जाते हैं। 

 धार्मिक महत्व: धार्मिक दृष्टि से श्रीफल अत्यंत कल्याणकारी और शुभ 

धार्मिक दृष्टि से श्रीफल (Coconut) अत्यंत कल्याणकारी और शुभ माना जाता है , क्योंकि इसे देवताओं का और लक्ष्मी जी का प्रिय फल माना जाता है।  यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में हर प्रकार के अनुष्ठान में नारियल का होना अनिवार्य है। नारियल के वृक्ष को कल्पवृक्ष के समान माना जाता है । मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत सोलह संस्कारों में नारियल होता ही है ।

प्राचीन समय में धार्मिक अनुष्ठानों में पशु बलि दी जाती थी लेकिन कालांतर में जीव हत्या को रोककर उसके स्थान पर नारियल बलि के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा । यह सुख, समृद्धि, सम्मान ,उन्नति और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में विवाह ,सम्मान, अतिथि सत्कार के समय नारियल देने की परंपरा है। नारियल का  ऊपरी भाग कठोर होता है और आंतरिक भाग नरम और मधुर इसीलिए इसकी तुलना पिता के प्यार और अनुशासन से भी की जाती है कि पिता बाहर से नारियल की तरह कठोर होते हैं लेकिन ह्रदय से अपने बच्चों के लिए उनका प्यार नारियल की तरह कोमल होता है। वही ईश्वर के समने  नारियल को फोड़ना धार्मिक दृष्टि से अहंकार और अहम को दूर करना या उसका नाश होने का प्रतीक है।

 पर्यावरणीय दृष्टि से पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं में प्रकृति संरक्षण की सर्वोच्च

पर्यावरणीय दृष्टि से पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं में प्रकृति संरक्षण की सर्वोच्च Image Credit :cocofina

पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं में प्रकृति संरक्षण की सर्वोच्च सोच के साथ ही हर वृक्ष में ईश्वर की कल्पना स्थापित की गई ताकि लोग पेड़ों की रक्षा करें।  पीपल,  वट वृक्ष,  नीम , आंवला,  तुलसी जैसे वृक्ष 24 घंटे ऑक्सीजन (24hrs Oxygen) देते हैं,  उसी प्रकार नारियल का पेड़ हवा से पानी को अवशोषित करता है और भूमिगत जल को संतुलित रखता है। वहीं समुद्री पक्षियों का यह आवास बनता है।  यह समुद्री प्राकृतिक तूफानों को आने से रोकने के लिए एक कवच की तरह काम करता है।  समुद्री तटों पर होने के कारण यह छाया  का तो काम करता ही है,  लेकिन साथ ही इसकी जड़ से शीर्ष तक का हर भाग मानव के लिए उपयोगी है । इसके पत्तों से, छाल से,  फल के आवरण से,  घास से, झाड़ू, हस्तकला की वस्तुएं, मकान की छत, रस्सियाँ बनाई जाती है, वहीं यह ईंधन का श्रेष्ठ स्रोत है जो पर्यावरण को अशुद्ध नहीं करता।

यही कारण है कि 2 सितंबर 1969 में एशियाई व  प्रशांत नारियल समुदाय (एपीसीसी) Asian and Pacific Coconut Community (APCC )  द्वारा विश्व नारियल दिवस मनाने की शुरुआत की गई,  क्योंकि इसी दिन इंडोनेशिया के जकार्ता में एपीसीसी की स्थापना हुई थी। 

सेहत का वरदान: नारियल स्वास्थ्य के लिए प्रकृति का एक वरदान 

 नारियल स्वास्थ्य के लिए प्रकृति का एक वरदान है । नारियल के पानी में विटामिन सी (Vitamin C),  पोटेशियम (Potassium) , मैग्नीशियम (Magnesium) भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।  वही नारियल में कई एंटी ऑक्सीडेंट (Anti-Oxidant) भी पाए जाते हैं।  नारियल एक अच्छी फाइबर का स्रोत है इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता तो बढ़ती ही है साथ ही यह एक बहुत ही पौष्टिक आहार का स्रोत है।  यह उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करता है , वही पेट और पाचन  संबंधी परेशानियों को भी दूर करता है । इससे याददाश्त बढ़ती है,  लीवर और गुर्दे की सफाई हो जाती है जिससे मूत्र संबंधित समस्याएं दूर हो जाती है।  अनिद्रा,  घबराहट और अशक्ति जैसी समस्याएं तो छूमंतर ही हो जाती है । यह बच्चों से लेकर , गर्भवती महिलाओं , बीमारों , बुजुर्गों सभी के लिए अत्यंत ही गुणकारी है। यह आँतों की जलन को शांत करता है।

नारियल पानी स्वास्थ्य के लिए प्रकृति का एक वरदान

मनुष्य के शरीर में त्रिदोष कहे गए हैं , वे है- वात,  पित्त और कफ।

  • इनमें से  वात और पित्त संबंधी दोषों को नारियल दूर कर देता है। यह रक्तशोधक है। 
  •  वही यह भोजन में स्वाद को बढ़ा देता है।  इससे बनने वाले मिष्ठान अति स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक होते हैं।
  •  वही सौंदर्य में निखार का यह एक अचूक इलाज है। यह त्वचा, बाल, नाखून के लिए तो गुणकारी है, लेकिन वही खराब कोलेस्ट्रॉल को बढ़ने नहीं देता है , जिससे मोटापा भी कम होता है।  नारियल और गुड़ का एक साथ सेवन  बहुत ही शक्तिवर्धक माना जाता है।
  • नारियल की प्रकृति ठंडी होती है इसीलिए सुबह खाली पेट या सूर्यास्त से पहले नारियल का सेवन स्वास्थ्य वर्धक माना गया है।

 ज्योतिष की दृष्टि से नकारात्मक ऊर्जा नारियल से दूर हो जाती है;

 ज्योतिष शास्त्र में जल. सफेद रंग और चांदी की वस्तुओं को चंद्र का रूप माना जाता है। चंद्र शांति का प्रतीक है इससे जीवन में शांति स्थापित होती है, ऐसा माना जाता है । नारियल से शनि दोष दूर किया जाता है। घर में किसी प्रकार की भी नकारात्मक ऊर्जा नारियल से दूर हो जाती है क्योंकि इसकी शिखाओं में अत्यधिक सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती है,  यही कारण है कि पूजन या किसी भी अनुष्ठान के समय जल कलश पर नारियल स्थापित किया जाता है।  नारियल पर जो तीन छोटे छेद होते हैं उन्हें बीज रूप माना जाता है जो स्त्रियों की प्रजनन क्षमता का  प्रतीक माना जाता है , और संतान सुख से जोड़ा जाता है।  यही कारण है कि पूजन के बाद पुरुष ही नारियल तोड़ते हैं स्त्रियाँ  नहीं।  यह भी मान्यता है कि नारियल का बीज यदि कोई नि: संतान औरत निगल ले तो उसे संतान प्राप्ति होती है।

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नारियल की पैदावार: 

 वैसे तो नारियल की उत्पत्ति किसी भी समुद्री तट या नदियों के किनारे मानी जाती है लेकिन भारत में  केरल ,कर्नाटक,  तमिलनाडु,  आंध्रप्रदेश में बड़े पैमाने पर इसकी खेती की जाती है । यह किसानों की आमदनी का एक प्रमुख स्रोत है , वहीं राष्ट्रीय आमदनी में भी इसका सबसे बड़ा योगदान है।

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