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दधिमती माता का ऐसा मंदिर जहां आते ही भक्त अपने सभी दुख-दर्द भूल जाते हैं

Dadhimati Mata
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एक मंदिर में ऐसा जहां आते ही, भक्त अपने सभी दुख-दर्द भूल जाते हैं. ऐसा लगता है मानों माता ने अपने भक्त की मन की पुकार सुन ली हो। और भक्त के जीवन से सारे कष्ट हर लीये हो। जी हां, ये मंदिर दधिमाता का है। कई लोग इस मंदिर को दधिमती माता मंदिर के नाम से भी पुकारते हैं।

ऐसा दावा है कि यह मंदिर पूरे उत्तर भारत का सबसे प्राचीन है। बताया जाता है कि इसका निर्माण 2000 साल पहले गुप्त काल में हुआ था। दधिमाता का मंदिर राजस्थान के नागौर जिले में गोठ और मांगलोद गांव के बीच स्थित है। मान्यता है कि दधिमता दाधीची ब्राह्णों की कुल देवी हैं।

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पुराणों के अनुसार दधिमती माता महर्षि दधीचि की बहन हैं। माता को देवी लक्ष्मी का अवतार भी माना जाता है। कहा जाता है कि उस समय इस क्षेत्र में दैत्य विताकासुर का बड़ा ही अत्याचार था। भक्तों की पुकार पर देवी ने विताकासुर का संहार किया। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां ताक के कपाल यानि चेहरे की आराधना की जाती है।

दधिमति माता के मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि मंदिर के गुंबद पर हाथ से पूरी रामायाण उकेरी गई है। कहा जाता है कि गुंबद का निर्माण आज से 1300 साल पहले हुआ था। गुंबद के 15 बड़े फलकों में भगवान श्री राम के वनवास से लेकर लंका विजय तक के दृश्य मनमोहक तरीके से बनाए हुए हैं।

कहा जाता है कि यहां अयोध्या के राजा मान्धाता ने बहुत बड़ा यज्ञ किया था। इस महायज्ञ के लिए राजा ने चार हवन कुंड बनाए थे। राजा मान्धाता ने उस समय अपने तप से चारों कुंडो में चार पवित्र नदियां गंगा, युमना, सरस्वती और नर्मदा का जल उत्पन्न किया था। हैरानी की बात है कि इन चारों कुंडों के पानी का स्वाद अलग-अलग है।

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ऐसा कहा जाता है कि मुगल काल में औरंगजेब ने मंदिर पर आक्रमण करने की योजना बनाई थी। जब उसकी सेना मंदिर को नष्ट करने पहुंची, तब अचानक मधुमक्खियों ने सेना पर हमला बोल दिया। सेना को उल्टे पांव वहां से भागना पड़ा। ये मधुमक्खियां मंदिर के गुंबद पर मौजूद थी। आज भी मधुमक्खियों का बसेरा यहां पर है।

नवरात्र में रोजाना एक हज़ार से अधिक श्रद्धालु मंदिर के प्रांगण में दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। इनके रहने-ठहरने की व्यवस्था मंदिर में ही की जाती है। मंदिर प्रांगण के पास ही ढाई सौ के करीब कमरे बनाये गए हैं, जहां नवरात्र में भक्त रूकते हैं। यहां पर ऐसी मान्यता है कि दाधीच समाज में लोग अपने बच्चों का रिश्ता बहुत पहले ही तय कर लेते हैं। और नवरात्र के समय बच्चों को आपस में दिखाकर मंदिर के प्रांगण में माता के सम्मुख रिश्ता पक्का करते हैं। नवरात्र में अष्टमी के समय पूरे देश से यहां भक्त आते हैं और माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। 

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