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कहानी आजादी की: एक ऐसा युवा क्रांतिकारी जिसके डर से अंग्रेज अधिकारी ने नौकरी छोड़ दी

KHUDIRAM BOSE
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15 अगस्त 1947 को भारत एक स्वतंत्र देश बन गया, लेकिन इस स्वतंत्रता के पीछे बलिदानों का इतिहास है. देश  आजादी के लिए जान न्यौछावर करने वालों में खुदीराम बोस (Khudiram Bose) का नाम बड़े गर्व के साथ लिया जाता है. एक ऐसे निर्भीक स्वतंत्रता सेनानी जिन्होंने अपनी जिंदगी देश के नाम कर दी. सबसे युवा क्रांतिकारी से अंग्रेज इतने डर गए थे कि उन्होंने फांसी की सजा सुनाई, फिर भी खुदीराम बोस विचलित नहीं हुए. फांसी के समय खुदीराम बोस केवल 18 वर्ष के थे. उस उम्र में बच्चे पढ़ाई और खेलकूद में लगे रहते हैं लेकिन खुदीराम बोस उस उम्र में आजादी का सपना संजोए बैठे थे.

 

3 दिसंबर 1889 को कोज बंगाल के मिदनापुर जिले में जन्मे खुदीराम बोस के माता-पिता की मृत्यु बचपन में ही हो गई थी, बचपन से ही खुदीराम बोस का नाता संघर्षों से जुड़ गया था. उनकी बड़ी बहन ने उनका पालन-पोषण किया. बंगाल विभाजन के बाद खुदीराम ने ब्रिटिश विरोधी आंदोलन में भाग लिया. उस समय खुदीराम केवल 14 वर्ष के थे. बताया जाता है कि स्कूल के दिनों में खुदीराम बोस की रुचि राजनीति में थी.

ये भी पढ़ें: कहानी आजादी की: एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी जिन्हें अंग्रेज ‘अशांति का जनक’ कहते थे लेकिन वो ‘लोकमान्य’ बन गए

शुरुआती दिनों में उन्होंने छोटे-छोटे विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया और ब्रिटिश विरोधी नारे लगाए. वह देश को आजाद कराने के लिए इतने जुनूनी थे कि वो आजादी के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार थे. बंगाल विभाजन के दौरान जब लोगों ने विरोध किया तो कई लोगों को कलकत्ता के मजिस्ट्रेट किंग्जफोर्ड ने उस समय बेरहमी से दंडित किया. ऐसे में ब्रिटिश सरकार किंग्जफोर्ड की इस कार्रवाई से खुश थी और किंगफोर्ड को मुजफ्फरपुर जिले में सत्र न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया, वहीं ब्रिटिश सरकार की इस कार्रवाई से क्रांतिकारियों को गुस्सा आ गया और उन्होंने किंग्जफोर्ड को मारने का फैसला किया. खुदीराम बोस और प्रफुल्ल कुमार चाकी को इस काम के लिए चुना गया.

 

अंग्रेजों ने खुदीराम बोस को किया गिरफ्तार 

मुजफ्फरपुर पहुंचने के बाद दोनों किंग्सफोर्ड के कार्यालय और घर की निगरानी में लग गए. 30 अप्रैल, 1908 को प्रफुल्ल कुमार चाकी और खुदीराम बोस जज किंग्सफोर्ड के बंगले के बाहर इंतजार कर रहे थे लेकिन उसी दौरान खुदीराम बोस ने गलती से एक बग्गी पर अंधेरे में बम गिरा दिया, पर इत्तेफाक से उस दिन किंग्सफोर्ड बच गया और उसकी जगह दो यूरोपियन महिलाओं को जान गंवानी पड़ी. बम धमाके के बाद जब हंगामा खड़ा हुआ तो खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी रेलवे स्टेशन पहुंचे, जहां शक के आधार पर पुलिस ने खुदीराम को गिरफ्तार कर लिया.

Khudiram Bose

Khudiram Bose

 

प्रफुल्ल चाकी ने खुद को मार ली थी गोली 

जबकि दूसरी ओर, प्रफुल्ल चाकी को ब्रिटिश सरकार में काम करने वाले एक व्यक्ति ने मदद की, जिसकी वजह से चाकी रात में ट्रेन पकड़ने में सफल रहे, लेकिन ट्रेन यात्रा के दौरान, ब्रिटिश पुलिस में काम करने वाले एक सब-इंस्पेक्टर को शक हुआ और उसने मुजफ्फरपुर पुलिस को सूचित कर दिया. चाकी जब हावड़ा के लिए ट्रेन बदलने के लिए मोकामाघाट स्टेशन पर उतरे तो पुलिस मौके पर मौजूद थी. चाकी ने अंग्रेजों के हाथों मरने के बजाय खुद को गोली मार ली और शहीद हो गए.

अंग्रेज अधिकारी ने डर से छोड़ दी थी नौकरी

अब इस मामले को लेकर खुदीराम बोस के खिलाफ मुकदमा चलाया गया. जिसमें खुदीराम बोस को फांसी की सजा सुनाई गई. हालांकि सजा सुनाए जाने के बाद भी 18 साल के खुदीराम बोस निर्भय नजर आए. कहा जाता है कि खुदीराम ने फांसी से पहले खुदीराम बोस ने हाथ में भगवद्गीता ली थी. खुदीराम बोस के शहीद होने के बाद उनकी लोकप्रियता इस कदर बढ़ी कि बंगाल में बनाई जाने वाली धोती पर खुदीराम का नाम लिखा जाने लगा और बंगाल के युवा धोती पहनकर आंदोलन में शामिल होने लगे. कहा जाता है कि बाद में किंग्सफोर्ड ने डर से अपनी नौकरी छोड़ दी थी.

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