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Guru Arjan Dev: जानिए कहानी सिखों के पहले शहीद की!

Guru Arjan Dev's sacrifice and valour
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सिखों के ५वे गुरु, गुरु अर्जन देव जी (Guru Arjan Dev) सिख धर्म के पहले शहीद थे. आध्यात्मिक जगत में गुरु जी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है . उन्हें ब्रह्मज्ञानी भी कहा जाता है . गुरु ग्रंथ साहिब में तीस रागों में गुरु जी की वाणी संकलित है . मानवता के सच्चे सेवक, धर्म के रक्षक, शांत और गंभीर स्वभाव के स्वामी गुरु अर्जन देव जी अपने युग के सर्वमान्य लोकनायक थे. वह दिन-रात संगत की सेवा में लगे रहते थे. उनके मन में सभी धर्मों के प्रति अथाह सम्मान था. उनकी शहादत सिख धर्म के इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था.

गुरु अर्जन देव (Guru Arjan Dev) जी का जन्म 15 अप्रैल सन् 1563 को गुरु रामदास जी (Guru Ramdas Dev) के घर गोइंदवाल (Goindwal Sahib) उनके ननिहाल में हुआ. अपने ननिहाल घर में ही उनका जीवन गुज़रा. अर्जन देव जी का पालन-पोषण गुरु अमरदास जी जैसे गुरु तथा बाबा बुड्ढा जी जैसे महापुरूषों की देख-रेख में हुआ था. उन्होंने गुरु अमरदास जी (Guru Amardas Dev) से गुरमुखी की शिक्षा हासिल की थी, जबकि गोइंदवाल साहिब जी की धर्मशाला से देवनागरी, पंडित बेणी से संस्कृत तथा अपने मामा मोहरी जी से गणित की शिक्षा प्राप्त की थी.  इसके अलावा उन्होंने अपने मामा मोहन जी से “ध्यान लगाने” की विधि सीखी थी. अर्जन देव जी का विवाह 1579 ईस्वी में मात्र 16 वर्ष की आयु में जलंधर (Jalandhar) जिले के मौ साहिब गांव में कृष्णचंद की बेटी गंगा जी के साथ हुआ. उनके पुत्र का नाम हरगोविंद सिंह था, जो गुरु अर्जन देव जी के बाद सिखों के छठे गुरु बने.

Guru Arjan dev's compilations in Guru Granth Sahib

संपादन कला के गुणी गुरु अर्जन देव (Guru Arjan Dev) जी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का संपादन भाई गुरदास की सहायता से किया था. उन्होंने रागों के आधार पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में संकलित वाणियों का जो वर्गीकरण किया है, उसकी मिसाल मध्यकालीन धार्मिक ग्रंथों में दुर्लभ है. श्री गुरु ग्रंथ साहिब में कुल 5894 शब्द हैं, जिनमें से 2216 शब्द गुरु अर्जन देव जी के हैं, जबकि अन्य शब्द भक्त कबीर, बाबा फरीद, संत नामदेव, संत रविदास, भक्त धन्ना जी, भक्त पीपा जी, भक्त सैन जी, भक्त भीखन जी, भक्त परमांनद जी, संत रामानंद जी के हैं. इसके अलावा सत्ता, बलवंड, बाबा सुंदर जी तथा भाई मरदाना जी व अन्य 11 भाटों की बाणी भी गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज है. श्री गुरु ग्रंथ साहिब के संकलन का कार्य 1603 ईस्वी में शुरू हुआ और 1604 ईस्वी में संपन्न हुआ था. श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रथम प्रकाश पर्व श्री हरिमंदिर साहिब 1604 ईस्वी में आयोजित किया गया था, जिनके मुख्य ग्रंथी की जिम्मेदारी “बाबा बुड्ढा जी” को सौंपी गई थी.

Guru Arjan Dev: सिखों  के पहले  शहीद

सिख गुरुओं ने धर्म के नाम पर बलिदान होने की ऐसी मिसालें पेश की हैं जो इतिहास के सुनहरे पन्नों में लिखी गई हैं मगर, इनमें सिखों के पांचवें गुरु अर्जन देव (Guru Arjan Dev) के बलिदान को सबसे महान माना जाता है. मानवता के उच्च आदर्शों और मानवीय मूल्यों की रक्षा के सिलसिले में किसी सिख द्वारा दी गई यह पहली शहादत मानी जाती है जिसके लिए वे शहीदों के सरताज माने जाते है.

गुरु ग्रंथ साहिब (Guru Granth Sahib) के संपादन को लेकर कुछ असामाजिक तत्वों ने अकबर बादशाह (Akbar) के पास यह शिकायत की थी कि इस ग्रंथ में इस्लाम के खिलाफ लिखा गया है, लेकिन बाद में जब अकबर को गुरुवाणी की महानता का पता चला, तो उसने भाई गुरदास एवं बाबा बुढ्ढा के माध्यम से 51 मोहरें भेंट कर खेद प्रकट किया था. अकबर की मौत के बाद जहाँगीर (Jahangir) दिल्ली का बादशाद बना और वह काफी कट्टर-पंथी था. अपने धर्म के अलावा, उसे और कोई धर्म पसंद नहीं था. गुरु जी के धार्मिक और सामाजिक कार्य भी उसे सुखद नहीं लगते थे. पंजाब से गुजरते हुए अकबर के पोते, खुसरो तरनतारन में गुरु अर्जन देव (Guru Arjan Dev) जी के दर्शन के लिए गए और उनका आशीर्वाद मांगा.

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इस बात से नाराज़ बाद 8 मई, 1606ई. को बादशाह ने गुरु जी को परिवार सहित पकडने का हुक्म जारी किया. जहाँगीर ने गुरु जी को सन्देश भेजा. बादशाह का सन्देश पड़कर गुरु जी ने अपना अन्तिम समय नजदीक समझकर अपने दस-ग्यारह सपुत्र हरगोबिंद जी को गुरुत्व दे दिया. उन्होंने भाई बुड्डा जी, भाई गुरदास जी आदि बुद्धिमान सिखों को घर बाहर का काम सौंप दिया. इस प्रकार सारी संगत को धैर्य देकर गुरु जी अपने साथ पांच सिखों- भाई जेठा जी, भाई पैड़ा जी, भाई बिधीआ जी, लंगाहा जी और पिराना जी को साथ लेकर लाहौर पहुँचे. दूसरे दिन जब वे अपने पांच सिखों सहित जहाँगीर के दरबार में गए. तो उसने कहा आपने मेरे बागी पुत्र को रसद और आशीर्वाद दिया है. आपको दो लाख रुपये ज़ुर्माना देना पड़ेगा नहीं तो शाही दण्ड भुगतना पड़ेगा.

जब गुरु ने हरगोबिंद जी के रिश्ते के लिए किया इनकार !

Guru Arjan's story

गुरु जी को चुप देखकर चंदू ने कहा कि मैं इन्हें अपने घर ले जाकर समझाऊंगा कि यह ज़ुर्माना दे दें और किसी चोर डकैत को अपने पास न रखें. चंदू उन्हें अपने साथ घर में ले गया. जिसमें पांच सिखों को ड्योढ़ि में और गुरु जी को ड्योढ़ि के अंदर कैद कर दिया. चंदू ने गुरु जी को अकेले बुलाकर यह कहा कि मैं आपका जुर्माना माफ करा दूँगा, कोई पूछताछ भी नहीं होगी. इसके बदले में आपको मेरी बेटी का रिश्ता अपने बेटे के साथ करना होगा और अपने ग्रंथ में मोहमद साहिब की स्तुति लिखनी होगी.

जिसे करने से गुरु से साफ़ इंकार कर दिया. गुरु जी का यह उत्तर सुनते ही चंदू भड़क उठा. उसने अपने सिपाहियों को हुकम दिया कि इन्हें किसी आदमी से ना मिलने दिया जाए और ना ही कुछ खाने पीने को दिया जाए. दूसरे दिन जब गुरु जी ने चंदू की दोनों बाते मानने से इंकार कर दिया तो उसने पानी की एक देग गर्म करा कर गुरु जी को उसमें बिठा दिया. गुरु जी को पानी की उबलती हुई देग में बैठा देखकर सिखों में हाहाकार मच गई. वै जैसे ही गुरु जी को निकालने के लिए आगे हुए, सिपाहियों ने उनको खूब मारा.

सिखों पर अत्याचार होते देख गुरु जी ने उन्हें परमेश्वर का हुकम मानकर शांत रहने को कहा. जब गुरु जी चंदू की बात फिर भी ना माने, तो उसने गुरु जी के शरीर पार गर्म रेत डलवाई. परन्तु गुरु जी शांति के पुंज अडोल बने रहे. गुरु जी का शरीर छालों से फूलकर बहुत भयानक रूप धारण कर गया. तीसरे दिन जब गुरु जी ने फिर चंदू की बात मानी, तो उसने लोह गर्म करवा कर गुरु जी को उसपर बिठा दिया. गुरु जी इतने पीड़ाग्रस्त शरीर से गर्म लोह पर प्रभु में लिव जोड़कर अडोल बैठे रहे. जब दिन निकला तो चंदू फिर अपनी बात मनाने के लिए गुरु जी के पास पहुँचा. परन्तु गुरु जी ने फिर बात ना मानी. उसने गुरु जी से कहा कि आज आपको मृत गाए के कच्चे चमड़े में सिलवा दिया जाएगा.

यहाँ पढ़ें: जानिए कैसे गुरु अमर दास जी ने मुग़ल बादशाह अकबर को चखाया लंगर ?

उसकी बात जैसे ही गुरु जी ने सुनी तो गुरु जी कहने लगे कि पहले हम रावी नदी में स्नान करना चाहते है, फिर जो आपकी इच्छा हो कर लेना. गुरु जी कि जैसे ही यह बात चंदू ने सुनी तो खुश हो गया कि इन छालों से सड़े हुए शरीर को जब नदी का ठंडा पानी लगेगा तो यह और भी दुखी होंगे. अच्छा यही है कि इनको स्नान कि आज्ञा दे दी जाए. चंदू ने अपने सिपाहियों को हुक्म दिया कि जाओ इन्हें रावी में स्नान कर लाओ. तब गुरु जी अपने पांच सिखों सहित रावी पर आ गए.

गुरु जी ने नदी के किनारे बैठकर चादर ओड़कर “जपुजी साहिब” का पाठ करके भाई लंगाह आदि सिखों को कहा कि अब हमरी परलोक गमन कि तैयारी है. आप जी श्री हरिगोबिंद को धैर्य देना और कहना कि शोक नहीं करना, करतार का हुकम मानना. हमारे शरीर को जल प्रवाह ही करना, संस्कार नहीं करना. इसके पश्चात् गुरु जी रावी में प्रवेश करके अपना शरीर त्याग कर सचखंड जी बिराजे.

गुरु अर्जन देव जी(Guru Arjan Dev) द्वारा रचित वाणी ने भी संतप्त मानवता को शांति का संदेश दिया. उनकी रचनाओं में मशहूर सुखमनी साहिब है जो की उनकी अमर-वाणी है. गुरु जी ने पंजाबी भाषा साहित्य एवं संस्कृति को जो अनुपम देन दी, उसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता.

इस अवदान का पहला प्रमाण ग्रंथ साहिब का संपादन है. इस तरह जहां एक ओर लगभग 600वर्षो की सांस्कृतिक गरिमा को पुन:सृजित किया गया, वहीं दूसरी ओर नवीन जीवन-मूल्यों की जो स्थापना हुई, उसी के कारण पंजाब में नवीन-युग का सूत्रपात भी हुआ.

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