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HomeUnknown फैक्ट्सएक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी जिन्हें अंग्रेज ‘अशांति का जनक’ कहते थे लेकिन वो ‘लोकमान्य’ बन गए

एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी जिन्हें अंग्रेज ‘अशांति का जनक’ कहते थे लेकिन वो ‘लोकमान्य’ बन गए

Lokmanya tilak
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आजादी की लड़ाई में कई ऐसे आंदोलनकारी हुए जिन्होंने आंदोलन को एक नई दिशा दी. इनमें लोकमान्य के नाम से मशहूर बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak) का नाम भी बड़े गर्व से लिया जाता है. ये वो मराठी स्वतंत्रता सेनानी रहे जिन्हें अंग्रेजों ने तो अशांति के जनक की उपमा दी लेकिन पूरी जनता ने उन्हें नेता के रूप में स्वीकारा और वो लोकमान्य (Lokmanya Tilak) बन गए.

 

स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है…का दिया नारा 

23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में जन्मे बाल गंगाधर तिलक के विचार इतने स्पष्ट और अनमोल थे कि मराठी में दिया गया उनका नारा स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है,  मैं इसे लेकर रहूंगा काफी प्रचलित हुआ. कहा जाता है कि साल 1897 में तिलक के खिलाफ पहली बार राजद्रोह का मुकदमा चला और इस मामले में वो जेल भी गए. जिसके बाद उन्हें लोकमान्य की उपाधि मिली. यूं तो कांग्रेस पार्टी में शामिल रहने वाले बाल गंगाधर तिलक कभी भी पूरी तरह से पार्टी की नीतियों के पक्ष में नहीं रहे, उन्होंने अंग्रेज सरकार की नीतियों के खिलाफ जहां जमकर विरोध जताया तो वहीं पार्टी की नीतियों के खिलाफ भी उनके अलग विचार थे. 

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गरम दल के नेता थे तिलक 

शायद यही वजह है कि जब कांग्रेस नरम दल और गरम दल के रूप में विभाजित हुई तो बाल गंगाधर तिलक गरम दल के नेता बने. उस वक्त लाल, बाल और पाल की तिकड़ी काफी चर्चित हुई थी. इन तीनों का नाम आज भी बड़े सम्मान और गर्व से लिया जाता है. इनमें लाल का पूरा नाम लाला लाजपत राय था जिन्होंने साइमन कमीशन का विरोध किया, सिर पर लाठी खाई लेकिन आखिरी सांस तक विरोध जारी रखा. जबकि का पूरा नाम ल गंगाधर तिलक था जिन्होंने अंग्रेजी शासन की क्रूर नीतियां और अंग्रेजों की भारतीय संस्कृति के प्रति हीन भावना की जोरदार आलोचना की.

 

राजद्रोह के आरोप में गए जेल 

ब्रिटिश सरकार की नीतियों के खिलाफ अपने पत्र केसरी में उन्होंने देश का दुर्भाग्य नाम के शीर्षक से एक ऐसा लेख लिखा कि उन्हें राजद्रोह के आरोपों का सामना करना पड़ा. साल 1897 में उन्हें 6 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई. लेकिन फिर भी वो इससे घबराए नहीं और साल 1908 में खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी के हमले का उन्होंने समर्थन किया. बताया जाता है कि जेल में उन्होंने कुछ किताबों की मांग की थी लेकिन अंग्रेजों ने उन्हें देने से मना कर दिया था. लोकमान्य तिलक एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिनकी आखिरी बार अपनी पत्नी से मुलाकात भी नहीं हो पाई, जेल में रहते हुए उन्हें खत मिला था कि उनकी पत्नी का निधन हो गया. 1 अगस्त 1920 को इस महान स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और वकील ने आखिरी सांस ली, लेकिन देश आज भी इन्हें लोकमान्य के नाम से जानता है.

 

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