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Homeनेचर एंड वाइल्ड लाइफएक ऐसा जीव जिसका खून बिकता है करोडों में, अब खतरें में पड़ी है पूरी प्रजाति

एक ऐसा जीव जिसका खून बिकता है करोडों में, अब खतरें में पड़ी है पूरी प्रजाति

Horseshoe crab
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(Horseshoe crab) हॉर्सशू क्रैब एक ऐसा जीव जो लाखों वर्षों से अपरिवर्तित है. लाखों वर्षों में हॉर्सशू क्रैब में कोई भी बदलाव नहीं आया. हॉर्सशू क्रैब की चार प्रजातियों में से दो भारत में पाई जाती हैं. भारत में उनके आवास सागर द्वीप और भितरकनिका जैसे क्षेत्रों में पश्चिम बंगाल और ओडिशा के समुद्र तटों तक ही सीमित हैं. ओडिशा और पश्चिम बंगाल में निवास की कुल लंबाई लगभग 150 किमी है.

शारीरिक रचना

हॉर्सशू क्रैब की एक अनूठी और आदिम शरीर संरचना होती है. शरीर तीन भागों से बना है: प्रोसोमा (सिर), ओपिसथोसोमा (मध्य क्षेत्र) और टेल्सन (पूंछ). हॉर्सशू क्रैब का नाम घोड़े के नाल के आकार जैसा दिखने वाले प्रोसोमा से मिला है. यदि समुद्र तट पर लहरें इसे पलट दें तो टेल्सन केकड़े को अपने आप पलटने में मदद करता है. टेल्सन जितना खतरनाक लगता है लेकिन विषैला नहीं होता.

हॉर्सशू क्रैब असल में क्रैब नहीं होता. LIVING FOSSILS कहे जाने वाला यह जीव सी स्कोर्पियन और स्पाइडर से संबंध रखता है. यह अद्भुत जीव को 10 आंखे होती है. हॉर्सशू क्रैब के फॉसिल्स 450 साल पहले से इस धरती पर मिले है.

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जून और ऑगस्ट महिने में हॉर्सशू क्रैब समुद्र किनारे के पास आ जाते है और मेटिग करते है. मेटिग पीरियड में नर मादा की पीठ पर चढ़ जाता है और तब तक पीछा नहीं छोड़ता जब तक मादा मेटिग के लिए तैयार न हो जाए. 

नर और मादा उथले पानी में आ जाते है यह मादा गड्ढा खोदकर  लगभग 4000 जितने अंडे देती है. स्पॉनिंग के दौरान, मादा आंशिक रूप से खुद को रेत में दबा लेती है, और लगभग 4,000 छोटे हरे अंडों को देती है. एक मादा कई अंडे के समूहों को स्पॉन करती है,और मादा कई रातों में बार-बार अंडे देकर 100,000 से अधिक अंडे दे सकती है.

इन अंडों में से दो से चार हफ्तों के बाद बच्चें निकलते है. लार्वा रेतीले समुद्र तटों से निकलते है और लगभग एक महीने बाद हाई टाइड के दौरान पानी में प्रवेश करते है. लार्वा बिना पूंछ के वयस्क horseshoe crab की तरह दिखते हैं.अंडे सेने के बाद, horseshoe crab अपने जीवन के पहले कुछ साल उखथे पानी में बिताते हैं और बड़े होने पर किनारे से दूर चले जाते हैं.

(Horseshoe crab) हॉर्सशू क्रैब का खोल सख्त होता है, इसलिए उन्हें बढ़ने के लिए खोल बदलना पडता है. हॉर्सशू क्रैब अपने जीवन के पहले वर्ष में कम से कम छह बार और यौन परिपक्वता तक पहुंचने से पहले लगभग 18 बार अपना खोल बदलते है.

horseshoe crab

(Horseshoe crab) हॉर्सशू क्रैब को यौन रूप से परिपक्व होने में कम से कम 9 साल लगते हैं, तो वे फिर से अपने खोल नहीं छोड़ते. जब नर अपना अंतिम मोल्ट पूरा कर लेता है, तो उसके पंजें का पहला सेट बॉक्सर के दस्ताने के आकार में बदल जाता है.  जिसका उपयोग वह स्पॉनिंग के लिए मादा को पकड़ने के लिए करता है. वयस्क आठ से 10 साल तक जीवित रह सकते हैं, जिनकी औसत उम्र 20 साल है.  हॉर्सशू क्रैब समुद्र के अंदर रेत में किडे,मोलुस्क और स्कैलोप्स खोदकर खाता है. दिखता है एलियन जैसा लेकिन सबसे जेंटल जीवों में से एक है.

हॉर्सशू क्रैब की पूंछ को देखकर लोग डर जाते है और मानते है की यह कोई जहरीला काटा है जो बेहद घातक जहर छोड़ेगा. पर ये सच नहीं है यह जीव की पूंछ पानी में या रेत में उन्हें उलटा हो जाने पर सीधा करने में मदद करती है. पूंछ में कोई जहर नहीं होता.

इंसान के कारण स्पॉनिंग के स्थल प्रभावित हो रहे है. समुद्र तट पर विकास और तटरेखा को बदलने में रेतीले तट खत्म हो रहे है. जब वे अंडे देने वाले क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं तो वहा वो फँस जाते है. क्योंकि इंसानों ने ज्यादातर उनके आवासों को नष्ट किया है. जिससे स्पॉनिंग न हो सके और आबादी आगे न बढ सके.इससे भी भयंकर खतरा है इन  हॉर्सशू क्रैब प्रजातियों को उनके नीले खून से है.

हॉर्सशू क्रैब विज्ञान के लिए एक चमत्कार है और इस जीव पर हो रहे विज्ञान के प्रयोग हॉर्सशू क्रैब के लिए जानलेवा है.  जिंदा जीवाश्म जैसा जीव उनके नीले खून की वजह से खतरे में है.

LAL पद्धति में हॉर्सशू क्रैब का अहम योगदान है. इस पद्धति में पता लगाया जाता है की नई दवा, वैक्सीन और इंजेक्शन बैक्टीरिया या कोई वायरस रहित है या नहीं. और इस खोज के लिए हॉर्सशू क्रैब का खून उपयोग में होता है. जब कभी भी वैक्सीन या कोई दवाई बनाई जाती है तब विश्व का सबसे महंगा प्रवाही यानी हॉर्सशू क्रैब का खून जो नीला रंग का होता उसकी जरूरत पडती है. 

Horseshoe crab blood

इस जीव का ख़ून इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे ये सुनिश्चित करने में मदद मिलती है की नई बनाई दवा में कोई हानिकारक बैक्टीरिया तो मौजूद नहीं है.  हॉर्सशू क्रैब के ख़ून से मिलने वाले ब्लड सेल दवा में मौजूद हानिकारक तत्वों से केमिकली रिएक्ट करते हैं और इस तरह से वैज्ञानिकों को पता चल जाता है की नई दवा इंसानों के लिए सुरक्षित हैं या नहीं.

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इस तरह हजारों केकड़ों को पकड़कर लैब्स में उनका खून निकाला जाता है उसके बाद उन्हें पानी में वापिस छोड़ दिया जाता है. तो भारत में कई जगह पर इन जीवों का व्यापार होता है. इस तरह 30 प्रतिशत खून निकल जाने के बाद हॉर्सशू क्रैब के जिंदा रहने के चांस बहुत कम हो जाते है, ऐसा बहुत सारे वैज्ञानिक मानते है. इसके विपरीत काफी वैज्ञानिक मानते है की केकड़ो का खून निकल जाने के बावजूद उन्हें कुछ नहीं होता.

खून का इस्तेमाल रोका जा सकता है?

हॉर्सशू क्रैब के खून की जगह दूसरी मानव निर्मित चीज़ का इस्तेमाल कर सकते है इस मुद्दे पर शोध जारी है.  2016 में हॉर्सशू क्रैब के खून का विकल्प वैज्ञानिकों ने शोध लिया था. जिसे स्वीकृति भी मिल गई थी. दवाओं की सुरक्षा को देखने वाले संगठनों ने सवाल किया था कि हॉर्सशू क्रैब के ख़ून का विकल्प कारगर है या नहीं ? अब वैज्ञानिकों को इस जीव को बचाने के लिए कोई कारगर विलक्प ढूंढना होगा ताकी एलियन जैसा दिखनेवाले Horseshoe Crab इस भागती दुनिया में टीक सके.

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