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क्यों भूमि बदल रही है मरुस्थल में

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हर साल दुनिया भर 1.2 करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा (land) भूमि सूखा, मरुस्थलीकरण और (land) भूमि क्षरण की भेंट चढ़ जाती है. यही नहीं जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ कृषि, शहरों और बुनियादी ढांचे के लिए (land) भूमि में बड़े पैमाने पर किया जा रहा बदलाव अब तक करीब 20 फीसदी से ज्यादा (land) भूमि को प्रभावित कर चुका है. इसका मतलब है कि दुनिया में करीब 200 करोड़ हेक्टेयर भूमि की गुणवत्ता आज पहले जैसी नहीं रह गई है, उसमें गिरावट आ गई है. इसमें कुल कृषि भूमि (land) का भी 50 फीसदी हिस्सा शामिल है. यही नहीं हर साल शुष्क भूमि (land)के हो रहे क्षरण के चलते दुनिया भर में सालाना 2,400 करोड़ टन उपजाऊ मिट्टी नष्ट हो जाती है. जिसका सबसे ज्यादा असर खाद्य उत्पादन और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ रहा है.

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यदि भूमि के महत्त्व की बात करें तो वह हमारे समाज की नींव है, जो वैश्विक खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण, गरीबी उन्मूलन, सस्ती ऊर्जा और भुखमरी को पूरी तरह खत्म करने की आधारशिला है. हालांकि इस पर सतत विकास के लिए बनाए 2030 के एजेंडा की सफलता निर्भर है इसके बावजूद सीमित संसाधनों के कारण इसका अस्तित्व खतरे में है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी माना है कि हमारे धरती की आज जो स्थिति है वो ठीक नहीं है.उनके अनुसार सूखा, मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण लगभग 320 करोड़ लोगों यानी विश्व की 40 फीसदी आबादी की जीविका को प्रभावित कर रहा है. दुनिया की करीब 70 फीसदी भूमि इंसानी गतिविधियों के चलते प्रभावित हुई हैं. ऐसे में जलवायु परिवर्तन और आने वाली पीढ़ियों की भलाई के लिए भूमि की पुनः बहाली और प्राकृतिक आधारित समाधानों को बढ़ावा देने की जरुरत है.

क्या है समाधान

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो अगले 10 वर्षों में करीब 100 करोड़ हेक्टेयर भूमि का बचाया जा सकता है. इसी को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष वोल्कन बोज़किर ने मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे पर एक उच्च-स्तरीय वार्ता आयोजित की है, जिसमें विश्व भर के नेता मिलकर आने वाले दशक के लिए दिशा निर्धारित करेंगें. संयुक्त राष्ट्र महासभा की उप महासचिव अमीना जे. मोहम्मद ने बैठक में जानकारी दी है कि आज हमारी धरती जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और प्रदूषण रूपी तीन खतरों का सामना कर रहा है. ऐसे में उन्होंने अगले दशक के लिए बैठक में चार प्राथमिकताएं बताई हैं जिनमें भूमि की बहाली पर जोर देना, वनों की अवैध कटाई को रोकना, कोविड-19 से उबरने के लिए भूमि आधारित समाधानों में निवेश करना और जलवायु संकट से निपटना शामिल हैं. 

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उनके अनुसार ऐसा करने से आर्थिक लाभ के साथ-साथ भूमि की बहाली को बढ़ाने और प्रतिबद्धताओं को कार्रवाई में बदलने के लिए वित्तपोषण में भी मदद मिलेगी. हमें अपने भूमि संसाधनों और पारिस्थितिक तंत्र को मापने की जरुरत है जिससे उनका मूल्यांकन किया जा सके, जिससे हमारी प्राकृतिक सम्पदा जैसे भूमि, जंगल, आर्द्रभूमि और अन्य पारिस्थितिक तंत्रों को भी आर्थिक रिपोर्टिंग में मान्यता मिल सके. इससे हमारी प्राकृतिक सम्पदा को भी आर्थिक सम्पदा की तरह ही बनाए रखा जा सके. यूएन कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन (यूएनसीसीडी) के कार्यकारी सचिव, इब्राहिम थियाव ने कहा कि सीधे शब्दों में कहें, तो कोरोना महामारी से उबरने के लिए भूमि आधारित दृष्टिकोण दुनिया को बदल सकता है. अब तक दुनिया की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाएं इससे उबरने के लिए करीब 1,172 लाख करोड़ रुपए खर्च कर चुकी हैं.

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वहीं हर साल इस रकम के केवल पांचवे हिस्से की मदद से वैश्विक अर्थव्यवस्था को शाश्वत विकास की राह पर लाया जा सकता है. अनुमान है कि  एक दशक में वैश्विक अर्थव्यवस्था करीब 40 करोड़ पर्यावरण अनुकूल नौकरियां पैदा कर सकती है. जिससे करीब 732 लाख करोड़ रुपए के बराबर आज सृजित होगी. गौरतलब है कि यह बैठक भूमि को हो रहे नुकसान और मृदा क्षरण के बारे में बढ़ती चिंताओं को ध्यान में रखकर आयोजित की है. इससे पहले जून की शुरुवात में पीबीएल नीदरलैंड्स एनवायर्नमेंटल असेसमेंट एजेंसी द्वारा एक रिपोर्ट से पता चला है कि यदि भूमि उपयोग सम्बन्धी नीतियों में तत्काल परिवर्तन नहीं किया जाता तो उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं.

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यदि नीतियों में बदलाव न किया गया तो उप सहारा अफ्रीका, मध्य और दक्षिण अमेरिका में खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग के चलते करीब 30 करोड़ हेक्टेयर भूमि साफ़ कर दी जाएगी. इससे जैवविविधता में 6 फीसदी की गिरावट आएगी और वातावरण में और 32 गीगाटन कार्बन मुक्त होगी. साथ ही इससे मिट्टी की गुणवत्ता और उसके पानी धारण करने की क्षमता में भी गिरावट आएगी. जिससे सूखे और बाढ़ की सम्भावना बढ़ जाएगी. हालांकि बहाली और संरक्षण दोनों की मदद से अब तक हमारे पास जितना ज्ञान और जानकारी है उसकी मदद से भूमि प्रबंधन में सुधार किया जा सकता है. इससे दुनिया की करीब 500 करोड़ हेक्टेयर भूमि को बहाल करने में मदद मिलेगी. इसके कारण फसलों की पैदावार बढ़ेगी और मिट्टी की जल धारण क्षमता में सुधार होगा. कार्बन भंडारण में बढ़ोतरी होगी और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी उल्लेखनीय कमी आएगी. इससे न केवल जैवविधता को होने वाले नुकसान में कमी आएगी साथ ही किसानों की आय में भी वृद्धि होगी.

इस महत्वाकांक्षी योजना की मदद से सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिलेगी. इससे 2030 तक करीब 30 फीसदी से अधिक भूमि को बचाया जा सकेगा. जैव विविधता को होने वाले एक तिहाई नुकसान को कम किया जा सकता है. इससे वैश्विक स्तर पर कृषि उपज में 9 फीसदी की वृद्धि होगी और नाटकीय रूप से कार्बन अवशोषण में वृद्धि आएगी. साथ ही ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी कमी आएगी. इब्राहिम थियाव के अनुसार यह कोई काल्पनिक परिदृश्य नहीं हैं, इन्हें हासिल कर पाना पूरी तरह हमारी क्षमताओं के भीतर ही है, बस सिर्फ ऐसा करने के लिए विश्व नेताओं के बीच दृढ़ संकल्प की जरूरत है.

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