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इजरायल के नेता मंसूर अब्बास ने पलटी बाजी

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इजरायल और फिलिस्तीन के बीच हुए संघर्ष के बाद इजरायल में सत्ता को लेकर इतना प्रभाव देखने को मिलेगा ये शायद किसिने नहीं सोचा था। इजरायल में लंबे समय से सत्ता पर काबिल प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की विदाई तय हो गई है। उनके विपक्षी पार्टियों के गठबंधन ने आखिरकार नई सरकार बनाने को लेकर सहमति जाहिर कर दी है। जिसके बाद अब नेफ्टाली बेनेट का इजरायल का अगला प्रधानमंत्री बनना तय माना जा रहा है। बता दें कि इस साल मार्च में हुए चुनाव में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को बहुमत नहीं मिल सका था। चुनाव में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी होन के बावजूद इजरायली राष्ट्रपति रुवेन रिवलिन ने नेतन्याहू को सरकार बनाने और 2 जून तक बहुमत साबित करने का आदेश दिया था।

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ISRAEL ELECTION : GOOGLE IMAGE

लोगों को आभास है कि यह एक आसान प्रयोग नहीं है मगर आबादी का बड़ा हिस्सा इसके प्रति अनुकूल रवैया दिखाता नज़र आ रहा है. साथ ही साथ इस नए डेवलपमेंट ने कई सवाल भी खड़े किये हैं.

जिन बातों पर ख़ासकर चर्चा हो रही है, वो है-आख़िर यह कौन अरब नेता हैं जो लीक से हटकर इतना बड़ा फ़ैसला कर रहे हैं. क्या यह सरकार लंबे समय तक टिक पाएगी? इस गठबंधन का इसराइल के अंदर, क्षेत्रीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या असर होगा?

MANSOOR ABBAS : GOOGLE IMAGE

यूनाइटेड अरब लिस्ट या रा’म पार्टी के प्रमुख डॉक्टर मंसूर अब्बास पेशे से दंत चिकित्सक हैं। 47 वर्षीय अब्बास का जन्म इसराइल के उत्तरी हिस्से में हुआ था. वो युवावस्था से ही राजनीति में सक्रिय हैं और हिब्रू विश्वविद्यालय में अरब छात्र समिति के अध्यक्ष रह चुके हैं। वर्तमान में अब्बास हाइफा विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में मास्टर डिग्री के लिए अध्ययनरत भी हैं।  डॉक्टर अब्बास इस्लामी आंदोलन की दक्षिणी शाखा के उपाध्यक्ष भी हैं।  हालांकि वो इजराइल के उत्तरी इलाक़े के रहने वाले हैं मगर दक्षिणी इलाक़ों में उनका अच्छा बोलबाला है।  उन्हें इजराइल के दक्षिणी इलाक़ों में ख़ासा समर्थन मिला, जिसके बदौलत उनकी पार्टी सारी अटकलों को झुठलाते हुए संसद में स्थान बना पाई। 

इजराइली चुनावी नियमों के मुताबिक़ किसी भी पार्टी को संसद में शामिल होने के लिए न्यूनतम 3.25 प्रतिशत वोट पाना होता है।  किसी समय इस नियम को बनाए जाने की वजह अरब पार्टियों को संसद से दूर करना था मगर इसकी वजह से उनमें एकता हुई और पिछले कुछ चुनावों में सभी अरब पार्टियों ने मिलकर चुनाव लड़ा है। हालाँकि अब्बास का बाक़ी अरब पार्टियों से सैद्धांतिक मतभेद नज़र आया और उन्होंने उनका साथ छोड़ने का फ़ैसला किया. इस फ़ैसले को कई लोगों ने आत्मघाती बताया और शुरुआती दौर में ऐसा लगा कि वो न्यूनतम वोट प्रतिशत की कसौटी पर भी सफल नहीं हो सकेंगे। 

ISARAEL POLITICIANS : GOOGLE IMAGE

मंसूर अब्बास को क़रीब से जानने वाले बताते है कि सौम्य स्वभाव के अब्बास सैद्धांतिक मूल्यों पर अडिग रहते हैं चाहे उसके लिए उन्हें कितनी भी बड़ी क़ीमत क्यों न चुकानी पड़े. आश्चर्य की बात यह है कि जिस बात को लेकर उनका बाक़ी दिग्गज अरब नेताओं से मतभेद था, कोई उम्मीद नहीं कर सकता था कि उस पर उन्हें सफलता मिलेगी। अब्बास का मानना है कि इसराइल में अरब आबादी के विकास के लिए ज़रूरी है कि उनके नेता मुख्यधारा की यहूदी पार्टियों के साथ मिलकर काम करें। 

चुनावों के पहले जब उन्होंने यह बात खुलकर स्थानीय मीडिया में कही तो अरब नेताओं ने उनके ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ दी. इसके बावजूद वो इस बात को दोहराते रहे और इसका उन्हें ख़ामियाजा भी भुगतना पड़ा. बाक़ी की अरब पार्टियों ने आख़िरी चुनाव में उनकी पार्टी को अपने गठबंधन में शामिल होने से इनकार कर दिया। चुनावी प्रचार शुरू करने के पहले ही डॉक्टर अब्बास ने घोषणा कर दी कि उनकी पार्टी संसद में चुने जाने पर किसी भी मुख्यधारा की यहूदी पार्टी के साथ काम करने को तैयार है जो अरब लोगों की तरक्की के लिए उनकी शर्तों को मानने के लिए राज़ी हो जाए।

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