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Homeकहानियां32 साल पहले राकेश टिकैत के पिता की मांगों के आगे भी झुकी थी सरकार, अब बेटे ने दोहराया इतिहास!

32 साल पहले राकेश टिकैत के पिता की मांगों के आगे भी झुकी थी सरकार, अब बेटे ने दोहराया इतिहास!

Boat Club Protest 1988
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आज के 32 साल पहले राजधानी दिल्ली का बोट क्लब किसानों(Boat Club Protest 1988) का धरनास्थल बन गया था. हालत ये हुई थी कि राजीव गांधी सरकार को किसानों की मांगों के आगे झुकना पड़ा था. अब 32 साल बाद केन्द्र सरकार को भी किसानों की मांगों के आगे झुकना पड़ा. बस अंतर समय और कुछ मांगों का है.

दरअसल अक्टूबर 1988 में राकेश टिकैत के पिता महेन्द्र सिंह टिकैत(Mahendra Singh Tikait), जिन्हें लोग बाबा टिकैत के नाम से जानते हैं, लाखों किसानों के साथ दिल्ली पहुंचे थे. कहते हैं कि 14 राज्यों के करीब 5 लाख किसानों ने इंडिया गेट से लेकर विजय चौक तक कब्जा कर लिया था.

Farmers Protest

Image Courtesy: Google.com

एक हफ्ते तक बोट क्लब पर डटे थे किसान

यहां तक कि किसान अपने साथ पशुओं को लेकर भी पहुंचे थे, जिन्हें वहीं बांध दिया था. उस वक्त किसान पूरी तैयारी के साथ दिल्ली पहुंचे थे, उनके पास अनाज, बिस्तर समेत हर वो इंतजाम था जो अभी के आंदोलन में आपने देखा होगा. उस वक्त भी सरकार ने कई तरह से आंदोलन को दबाने की कोशिश की लेकिन बाबा टिकैत के नेतृत्व में किसानों का हौसला नहीं डिगा.

राजीव गांधी सरकार ने मांगी थी सभी मांगें

कहते हैं कि किसान आंदोलन की वजह से राजीव गांधी सरकार(Rajiv Gandhi Government) को अपने प्रोग्राम की जगह तक बदलनी पड़ी थी. आखिरकार 35 सूत्री मांगों को लेकर दिल्ली पहुंचे बाबा टिकैत की सभी मांगें मानने का ऐलान राजीव गांधी सरकार ने कर दिया. आखिरकार एक हफ्ते बाद 31 अक्टूबर 1988 को किसानों का विशाल आंदोलन खत्म हो गया. उसके बाद ही सरकार ने बोट क्लब पर प्रदर्शन की अनुमति देना बंद कर दिया और तब से जंतर-मंतर पर ही प्रदर्शन का आयोजन होता है.  

Farmers Protest

Image Courtesy: Google.com

बोट क्लब आंदोलन की तरह ही निकला परिणाम

तीनों कृषि कानूनों(3 Farm Laws) के विरोध में जब किसानों ने दिल्ली कूच का ऐलान किया और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की मांग की थी तब भी लोगों को बाबा टिकैत की याद आने लगी थी. आखिरकार इस आंदोलन का परिणाम भी बोट क्लब(Boat Club Protest 1988) वाले आंदोलन की तरह ही निकला. करीब 700 किसानों की मौत के बाद सरकार को किसानों को आगे झुकना पड़ा.

ये भी पढ़ें: जानिए, क्या हैं वो तीन कृषि कानून जिसे रद्द करने की प्रक्रिया 29 नवंबर से शुरू होने वाले संसद सत्र में पूरी की जाएगी

किसानों के आगे दूसरी बार झुकी मोदी सरकार

हालांकि किसान आंदोलन के दौरान कई ऐसी चीजें हुईं जिसे लेकर विवाद खड़ा हुआ. 26 जनवरी को ट्रैक्टर परेड के दौरान हुई हिंसा और खालिस्तानी कनेक्शन की भी अफवाहें उड़ीं लेकिन गाजीपुर बॉर्डर पर डटे राकेश टिकैत(Rakesh Tikait) के आंसूओं ने आंदोलन को एक नई दिशा दे दी.

Farmers Protest

Image Courtesy: Google.com

देश के इतिहास में सबसे लंबा चलने वाला ये किसान आंदोलन अब खत्म होने की कगार पर है, लेकिन इसी के साथ ऐसा दूसरी बार होगा जब मोदी सरकार को किसानों के आगे झुकना पड़ा. इससे पहले भूमि अधिग्रहण बिल(Land Acquisition Bill) के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर लंबे समय तक चले विरोध प्रदर्शन के बाद भी सरकार ने इस कानून को वापस लेने का फैसला लिया था.

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