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जन्माष्टमी पर जानिए, भगवान श्रीकृष्ण के द्वारका से डाकोर जाने की कहानी

shri ranchhodraiji maharaj temple
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जिनकी जन्मभूमि मथुरा है, लेकिन कर्मभूमि गुजरात है, जिनके चरणों में परिपूर्णता है, लेकिन जिनकी लीलाएं अपरंपार है. उन भगवान श्रीकृष्ण का एक स्वरूप रणछोड़रायजी ( Ranchhodraiji Maharaj Temple) में भी विराजमान है. जो गुजरात के खेड़ा जिले में स्थित है. इस जन्माष्टमी (Janmashtami) पर हम आपको बताएंगे कि भगवान श्रीकृष्ण के द्वारका से डाकोर जाने की कहानी क्या है. दरअसल मान्यता है कि प्राचीन काल में डंक ऋषि ने महादेव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी. 

डाकोर आने की कहानी भी है दिलचस्प…

वहीं डंकपुर गोमती तट पर डंकनाथ महादेव के नाम पर एक मंदिर और डंकऋषिजन के नाम पर एक शहर है. उसी के डाकोर गांव में बरसों पहले एक बच्चे का जन्म हुआ.वह बच्चा विजयसिंह राजपूत यानी भक्त बोडाणा. बचपन से ही भगवान की स्तुति करने वाले भक्त बोडाणा ने हर पूर्णिमा को द्वारकाधीश जाने का फैसला किया. बोडाणा की भक्ति अनवरत चलती रही.

shri ranchhodraiji maharaj temple

भगवान के चरणों में गिर पड़े बोडाणा

जब भक्त बोडाणा वृद्ध होकर द्वारका गए, तो उन्होंने भगवान से कहा, हे भगवान, मैं अपनी उम्र के कारण अब दर्शन के लिए द्वारका नहीं आ सकता, लेकिन भगवान ने कुछ भी जवाब नहीं दिया, इसलिए भक्त बोडाणा उनके चरणों में गिर पड़े.

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आकाशवाणी हुई कि डाकोर अवश्य आऊंगा

आकाश से एक आवाज आई, खड़े हो जाओ बोडाणा, मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ. मैं तुम्हारे साथ डाकोर अवश्य आऊँगा. अब जब भी आप दूसरी बार द्वारका आएं तो एक बैलगाड़ी लेकर आएं. दूसरी बार भक्त बोडाणा द्वारका गए, उन्होंने एक बैलगाड़ी ली, भक्त बोडाणा के रथ को स्वयं भगवान के पास ले जाया.

नीम की शाखा आज भी मीठी है

सुबह-सुबह डाकोर के पास, सिमलाज गांव के पास, भगवान ने नीम के पेड़ से एक दातून दिया वो नीम की एक शाखा आज भी मीठी है. आज यहां एक छोटा सा मंदिर है, जिसमें भगवान के चरणपादुका हैं.भक्त बोडाणा और भगवान डोकोर आए. भगवान की पहली मूर्ति बनाई गई थी जहां भक्त बोडाणा रहते थे,  वह मंदिर आज भी मौजूद है..वर्तमान में रणछोड़रायजी का भव्य मंदिर ( Ranchhodraiji Maharaj Temple) जो आप देख रहे हैं वह एक नया मंदिर है. मंदिर में रणछोड़रायजी की गहरे रंग की मूर्ति को देखते ही भक्त भक्ति में डूब जाते हैं.

यहां भगवान रणछोड़रायजी साक्षात विराजमान हैं

डाकोर में भगवान को श्रद्धांजलि देने के लिए दूर-दूर से भक्त यहां आते हैं. इस विशाल पौराणिक मंदिर की नक्काशी भी बहुत उत्कृष्ट है.गोमती घाट का संबंध महाभारत से भी है. गोमती सरोवर में स्नान और जल का विशेष महत्व है भक्त बोडाणा जब द्वारका से भगवान को ले आए तो सबसे पहले गोमती सरोवर में स्नान किया.

आकाश से स्वस्तिक की तरह दिखता है स्वरूप

वर्तमान में यहां रणछोड़रायजी का भव्य मंदिर (Ranchhodraiji Maharaj Temple) है. उनसे पहले रणछोड़रायजी की मूर्ति दूसरे मंदिर में विराजमान थी. जब भगवान की मूर्ति को नए मंदिर में ले जाया गया, तो लक्ष्मीजी वहां प्रकट हो गईं. रणछोड़रायजी हर शुक्रवार, ग्यारहवें दिन और त्योहारों पर पालकी के स्वरूप में लक्ष्मीजी से मिलने आते हैं. डाकोर मंदिर में हिंडोला देखना भी एक सौभाग्य की बात है. रणछोड़रायजी के मंदिर का निर्माण इस तरह से किया गया है कि अगर हवाई दृश्य से देखा जाए तो स्वस्तिक की तरह दिखता है.

भगवान रणछोड़जी हर भक्त की मनोकामना पूर्ण करते हैं. जिस धरा पर भगवान ने अपना लीला की वह पवित्र और हमेशा के लिए पूजनीय हो गया है.

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