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जानिए, तालिबान पर क्यों भारी पंजशीर के ‘शेर’

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पंजशीर (Panjshir) यानी पांच शेरों की घाटी, एक ऐसा इलाका जहां पर तालिबानियों के घुसने की हिम्मत नहीं होती है. ये वही घाटी है जहां के जाबाज लड़ाकों ने रूसी सेनाओं और तालिबानियों को धूल चटा दी थी. अफगानिस्तान पर तालिबान के काबिज होने के बाद से एक बार फिर से यह घाटी चर्चा का विषय बनती जा रही है. अफगानिस्तान में तालिबानियों के कब्जे में 32 प्रांत आ चुके हैं. राष्ट्रपति अशरफ गनी की सरकार गिर चुकी है और वे देश छोड़ कर फरार हैं.

तालिबान अपनी सरकार बनाने के लिए नए-नए प्रस्ताव दे रहा है लेकिन अफगानिस्तान में एक ऐसा इलाका भी है जहां तालिबान के झंडे के रंग का असर नहीं चढ़ पाया है. पंजशीर घाटी राजधानी काबुल से 150 किलोमीटर दूर हिंदूकुश पहाड़ों के नीचे है. इस घाटी को पहले परवान प्रांत कहा जाता था. ऐसा कहा और माना जाता है कि पंजशीर का नाम पंचमी नदी से आया है. जिसका जिक्र हिंदू पौराणिक कथा महाभारत में है.

 

अफगानिस्तान का सुरक्षित इलाका पंजशीर 

पंजशीर घाटी एक ऐसा इलाका है जहां जाना आसान नहीं है ये इलाका दिक्क्तों से भरा है. सालंग पास से जोड़ते हुए यह घाटी काबुल को उत्तरी और दक्षिणी अफगानिस्तान से जोड़ती है. यहां पर तालिबान को आने के लिए ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों से गुजरना होगा, जो कि बिलकुल भी आसान नहीं है. इस घाटी के डेढ़ लाख से ज्यादा लोग ताजिक समुदाय से हैं. यह घाटी पन्ना के भंडार के लिए मशहूर है. पन्ने यानि अनमोल रत्न का भंडार. इसी भंडार ने कई विद्रोही आंदोलनों को आर्थिक सहायता भी दी है. जब तालिबान ने अफगानिस्ताएन पर कब्जा नहीं किया था तो पंजशीर घाटी की तरफ से लगातार केंद्रीय सरकार से मदद की मांग की जाती रही. पंजशीर अफगानिस्ता़न का सबसे सुरक्षित इलाका माना जाता है.

पंजशीर घाटी हमेशा से अफगानिस्तान के लिए बहुत ही इंपॉरटेंट मार्ग रहा है. जहां करीब 100 किलोमीटर का लंबा मार्ग है. इसी मार्ग से 13वीं सदी में सिकंदर और तैमूर की सेनाएं आती-जाती थीं. पंजशीर घाटी अफगानिस्तान के लिए आर्थिक विकास का इलाका रहा है. बता दें कि यहां पर एक रेडियो टावर है जिसकी बदौलत काबुल के लोगों को रेडियो सिग्नल मिलता है. पंजशीर घाटी के रास्ते से आने पर तालिबानियों को काफी ज्यादा संघर्ष की स्थिति का सामना करना पड़ेगा. इस घाटी में जगह-जगह पर रूस के टैंक्स, सैन्य वाहनों और पुराने पुराने सैन्य सामानों का ढेर मिलेगा. रूस ने 1979 से लेकर 1985 तक कई बार पंजशीर घाटी के जरिए अफगानिस्तान पर कब्जा करने की कोशिश की लेकिन हर बार विफल रहे.

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तालिबान के खिलाफ लड़ाई की तैयारी 

सोवियत संघ ने एक बार नहीं बल्कि 9 बार इस घाटी पर हमला किया लेकिन एक बार भी फतह हासिल नहीं हुई. अफगानिस्तान की सरकार भी इस युद्ध में रूस का साथ दे रही थी, ताकि वह पंजशीर घाटी पर कब्जा कर सके. अहमद शाह मसूद की सेना के आगे इन सबकी एक न चली. अहमद शाह मसूद अफगानिस्ताान के तालिबानी व्रिदोही बल के नेता थे. तालिबान अहमद शाह मसूद को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता था. घटना 9/11 से ठीक दो दिन पहले अहमद शाह मसूद की फिदायीन हमले में हत्या कर दी गई थी.

अहमद शाह मसूद की बदौलत तालिबान से लोहा लेने का जज्बा आज पंजशीर के एक-एक कण और एक एक व्यक्ति में भर गया है और अब उनके बेटे अहमद मसूद और उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह को पंजशीर में देखा गया है. सूत्रों के मुताबिक हथियारबंद लड़ाकों के साथ उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह और अहमद मसूद पंजशीर को तालिबान के खिलाफ लड़ाई में तैयार करने में जुटे हुए हैं.

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