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जानिए कैसे गुरु अमर दास जी ने मुग़ल बादशाह अकबर को चखाया लंगर?

Guru Amar Das Dev Ji's life journey
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जहाँ सिख धर्म के पहले दो गुरु, गुरु नानक देव और गुरु अंगद देव जी ने सिख धर्म के संदेश को फैलाने में अपना जीवन व्यतीत किया वही सिख धर्म के तीसरे गुरु अमरदास जी(Guru Amar das Ji) ने समाज से भेदभाव खत्म करने में बड़ा योगदान दिया। गुरु अमरदास जी बड़े आध्यात्मिक चिंतक तो थे ही, उन्होंने समाज को विभिन्न प्रकार की सामाजिक कुरीतियों से मुक्त करने के लिए सही मार्ग भी दिखाया। सिख बनने से पहले, अमर दास ने अपने जीवन के लिए हिंदू धर्म की वैष्णव धर्म परंपरा का पालन किया था। हिन्दू धर्म से सिख धर्म का ये परिवर्तन कुछ इस तरह शुरू हुआ..

Guru Amar Das Dev Jiसिखों के तीसरे गुरु, गुरु अमर दास जी का जन्म ५ अप्रैल १४७९७ ई. में अमृतसर(Amritsar) के ‘बासर के’ गांव (जोकी आज अमृतसर नाम से जाना जाता है) में पिता तेजभान एवं माता लखमीजी के घर हुआ था। 24 वर्ष की आयु में, उनका विवाह माता मंसा देवी जी से हुआ था। उनकी चार संतानें थी जिनमें दो पुत्रिायां- बीबी दानी जी एवं बीबी भानी जी थी। बीबी भानी जी का विवाह सिख धर्म के चोथे गुरु, गुरु रामदास साहिब जी (Guru Ramdas Sahib Ji) से हुआ था। गुरु अमर दास जी बड़े आध्यात्मिक चिंतक थे। वे दिन भर खेती और व्यापार के कार्यो में व्यस्त रहने के बावजूद हरि नाम सिमरन में लगे रहते। लोग उन्हें भक्त अमरदास जी कहकर पुकारते थे। उन्होंने 21 बार हरिद्वार (Haridwar) की पैदल फेरी लगाई थी। सिख धर्म के संपर्क में आने से पहले गुरु अमर दास 60 साल की उम्र पार कर चुके थे।

‘तृतीय नानक’ बनने का सफर 

गुरु अमरदास जी कई बार हरिद्वार की यात्रा को जाते थे, १५३९ जब वे ऐसी हे एक यात्रा पर निकले तभ ही उनकी मुलाकात एक साधू से हई जिन्होंने उनसे उनके गुरु के बारे में पूछा। कोई गुरु ना होने के कारण उन्होंने एक गुरु खोजने की ठान ली। और यहीं से उनका एक धर्मनिष्ठ सिख बन्ने का सफ़र शुरू हुआ। साधू के प्रश्न से दुविधा में पड़े गुरु अमरदास जी जब यात्रा से लौट रहे थे उस समय उन्होंने अपने भाई माणक चंद की पुत्रवधू बीबी अमरो को गुरु नानक(Guru Nanak) के भजन गाते सुना। उसे सुनकर वे इतने प्रभावित हुए कि पुत्रवधू से गुरु अंगद देव जी (Guru Angad Dev Ji) का पता पूछकर तुरंत वे गुरु अंगद साहिब से मिलने के लिए खडूर साहिब गये। उन्होंने 61 वर्ष की आयु में अपने से 25 वर्ष छोटे और रिश्ते में समधी लगने वाले गुरु अंगद देव जी को गुरु बना लिया और लगातार 11 वर्षों तक एकनिष्ठ भाव से गुरु सेवा की। वे नित्य सुबह जल्दी उठ जाते व गुरु अंगद देव जी के स्नान के लिए ब्यास नदी से जल लाते। और गुरु के लंगर लिए जंगल से लकड़ियां काट कर लाते। गुरु अंगद साहिब ने गुरु अमरदास साहिब को ‘तृतीय नानक’ के रूप में मार्च १५५२ को ७३ वर्ष की आयु में स्थापित किया। गुरु अमरदास साहिब जी की भक्ति एवं सेवा गुरु अंगद साहिब जी की शिक्षा का परिणाम था।

Baba Amar Das Ji served Guru Angad Dev Ji

भक्ति में विलीन, गुरु अमरदास जी ने ना सिर्फ अपना पूरा जीवन गुरु की सेवा में लगाने का निश्चय किया बल्कि उन्होंने सक्रिय रूप से गुरु की सेवा शुरू की और सामुदायिक सेवाओं में भाग लिया। भारतीय समाज ‘सामंतवादी समाज’ होने के कारण अनेक सामाजिक बुराइयों से ग्रस्त था। उस समय जाति-प्रथा, ऊंच-नीच, कन्या-हत्या, सती-प्रथा जैसी अनेक बुराइयां समाज में प्रचलित थीं। ये बुराइयां समाज के स्वस्थ विकास में अवरोध बनकर खड़ी थीं। गुरु अमरदास जी ने ऐसी बुराइयां से लड़ने के लिए एक उपाय पेश किया जो अब दुनिया में काफी प्रसिद्ध हुआ है।

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लंगर प्रथा की शुरुवात

समाज की कुरीतियों के विरुद्ध में गुरु अमरदास जी ने बड़ा प्रभावशाली आंदोलन चलाया। जाति-प्रथा एवं ऊंच-नीच को समाप्त करने के लिए गुरु जी ने लंगर प्रथा को और सशक्त किया। उस जमाने में भोजन करने के लिए जातियों के अनुसार ‘पांतें’ लगा करती थीं, लेकिन गुरु जी ने सभी के लिए एक ही पंगत में बैठकर ‘लंगर छकना’ (भोजन करना) अनिवार्य कर दिया। यही नहीं, छुआछूत को समाप्त करने के लिए गुरु जी ने गोइंदवाल साहिब (Goindwal Sahib) में एक ‘सांझी बावली’ का निर्माण भी कराया। कोई भी मनुष्य बिना किसी भेदभाव के इसके जल का प्रयोग कर सकता था।

Mughal King Akbar eating Langar

Image credit: The Golden Temple Amritsar

गुरु जी की लंगर प्रथा ने के इस तरीके ना सिर्फ आम लोगो को बल्कि मुग़ल के बादशाह अकबर को भी अचंबित कर दिया था. जब मुग़ल बादशाह लाहौर से दिल्ली को वापिस आ रहे थे तब वे गुरु दर्शन हेतु गोइंदवाल साहिब पोहंचे। अकबर बादशाह यह देखकर दंग रह गए कि गुरु जी का अटूट लंगर बिना किसी जात-पात व भेदभाव के बगैर चल रहा था| तब उन्ही लोगों के बिच अकबर ने भी पंगत में बैठ कर लंगर छका और इस प्रथा से प्रसन्न होकर उन्होंने गुरु के लंगर के लिए झबाल के 12 गांवों की जागीर उन्हें भेट में दी जिसे बाद में गुरु अमरदास जी ने अपनी सुपुत्री बीबी भानी व रामदास की सेवा पर प्रसन्न होकर उनको दे दी।

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गुरु जी का एक अन्य क्रांतिकारी कार्य सती-प्रथा की समाप्ति था। सती-प्रथा जैसी घिनौनी रस्म को स्त्री के अस्तित्व का विरोधी मानकर, उसके विरुद्ध जबरदस्त प्रचार किया। गुरु जी द्वारा रचित ‘वार सूही’ में सती प्रथा का ज़ोरदार खंडन किया है। इतिहासकारों का मत है कि गुरु जी सती प्रथा के विरोध में आवाज उठाने वाले पहले समाज सुधारक थे। यह गुरु अमरदास जी एवं बाद के अन्य समाज सुधारकों के प्रयत्नों का ही फल है कि आज का समाज अनेक बुराइयों से दूर हो सका है।

दामाद को किया गुरुमत प्रदान

Guru Amar das blessed Guru Ramdas

गुरु साहिब ने अपने किसी भी पुत्रा को सिख गुरु बनने के लिए योग्य नहीं समझा, इसलिए उन्होंने अपने दामाद गुरु रामदास साहिब को गुरुपद प्रदान किया। गुरु रामदास साहिब में सिख सिद्धान्तों को समझने एवं सेवा की सच्ची श्रद्धा थी और वो इसके पूर्णतः काबिल थे। गुरु अमरदास जी 95 वर्ष की आयु में 1574 ई. में गोइंदवाल साहिब में ज्योति जोत समा गए। गुरु अमर दास ने अमृतसर गाँव में एक विशेष मंदिर के लिए स्थल का चयन किया, जिसे गुरु राम दास ने बनाना शुरू किया, गुरु अर्जन ने पूरा किया और उद्घाटन किया, और सिख सम्राट रणजीत सिंह ने उनका स्वागत किया। गुरु साहिबान की बानी को संकलित करने का स्वप्न भी उन्होंने ही देखा था, जिसे बाद में उनके नाती पांचवें गुरु अर्जन देव जी ने ‘गुरु ग्रंथ साहिब'(Guru Granth Sahib) का संपादन करके पूरा किया। ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में तीसरे गुरु के 869 सबद, श्लोक व छंद 18 रागों में दर्ज हैं। ‘आनंदु साहिब‘(Anand Sahib) उनकी उत्कृष्ट वाणी है।

 

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