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क्यों मांगनी पड़ी मां पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती को मां अनुसूया से माफी

Anusuya Mata
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आज बात करेंगे हिमालय की ऊंची दुर्गम पहाड़ी की, जहां स्थित है मां अनुसुया देवी का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल। यह मंदिर देखने में जितना सुंदर है यहां पहुंचना उतना ही कठिन। देवी के दर्शन के लिए भक्तों को पैदल चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। 

देवी का ये मंदिर काफी पुराना है और इस स्थल का महान पुरातात्विक महत्व भी है। यह माना जाता है कि यह एकमात्र ऐसा स्थान है जहां भक्त श्रद्धा के निशान के रूप में नदी के चारों ओर घूमते हैं। यहां मंदिर में प्रवेश से पहले भगवान गणेश जी की भव्य प्रतिमा के दर्शन प्राप्त होते हैं।

भगवन गणेश की भव्य प्रतिमा के बारे में मान्यता है कि यह शिला प्राकृतिक रूप से निर्मित है। मंदिर का निर्माण नागर शैली में हुआ है। मंदिर के गर्भ गृह में सती अनुसूया की भव्य मूर्ति स्थापित की गई है। साथ ही मूर्ति पर चाँदी का छत्र रखा हुआ है। श्री अनुसूया माता के मंदिर के निकट ही “महर्षि आत्री तपोस्थली” और “दत्तात्रेय” स्थली है। मंदिर के प्रांगण में भगवान शिव, माता पार्वती एवं गणेश जी की प्रतिमा देखी जा सकती है।

देखें ये वीडियो: हिमालय की ऊंची दुर्गम पहाड़ी की, जहां स्थित है मां अनुसुया देवी का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल

कैसे रखा नाम ‘मां सती अनुसूया’

अनुसूया देवी का मंदिर एक प्राचीन हिन्दू मंदिर है। अनुसूया देवी मंदिर के बारे में जो कथा प्रचलित है उसके अनुसार कहा जाता है कि इस स्थान को “अत्री मुनि” ने अपनी तपस्या का स्थान बनाया था, और एक कुटिया बनाकर यहां रहने लगी। पतिव्रता होने की वजह से देवी अनुसूया की प्रसिद्धी तीनों लोकों में फैल गई थी, जिसे देखकर देवी लक्ष्मी, देवी पार्वती और देवी सरस्वती के मन में ईर्ष्या का भाव पैदा हो गया। इस वजह से तीनों देवियों ने अपने पति भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा जी से देवी अनुसुया की परीक्षा लेने को कहा। तीनों भगवान ने देवियों को समझाने की कोशिश की लेकिन देवियां नहीं मानी, अंतत हारकर तीनों भगवान देवी अनुसूया के द्वार पहुंचे।

वहां जाकर तीनों ने साधु का रूप धारण किया और देवी से भोजन की मांग करने लगे। जैसे ही देवी अनुसूया साधुओ को भोजन देनेलगती है, तो तीनों साधू देवी अनुसूया के सामने भोजन स्वीकार करने के लिए एक शर्त रखते है कि देवी अनुसूया को निवस्त्र होकर भोजन परोसना होगा, तभी साधू भोजन ग्रहण करेंगे। इस बात पर देवी अनुसूया चिंता में डूब जाती है और सोचती है कि वो ऐसा कैसे कर सकती है। अंत में देवी आंखे मूंद कर पति को याद करती है, जिससे कि उन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाती है तथा साधुओं के वेश मे उपस्थित देवों को देवी अनुसूया पहचान लेती है। तब देवी अनुसूया कहती है कि जो साधू चाहते है वो अवश्य पूर्ण होगा, लेकिन इसके लिए साधुओ को शिशु रूप लेकर उनका पुत्र बनना होगा।

इस बात को सुनकर तीनो देव शिशु रूप में बदल जाते है और फलस्वरुप, माता अनुसूया निवस्त्र होकर तीनो देवो को भोजन करवाती है। इस तरह तीनों देव, देवी अनुसूया के पुत्र बन कर रहने लगते है। अधिक समय बीत जाने के बाद भी जब तीनों देव देवलोक नहीं पहुँचते है, तो देवी पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती चिंतित और दुखी हो जाती है और देवी अनुसूया के समक्ष जाकर माफ़ी मांगतीं है। अपने पतियों को बाल रूप से मूल रूप में लाने की प्रार्थना करती है। माता अनुसूया देवियों की प्रार्थना सुनकर तीनों देवो को माफ़ी के फलस्वरूप तीनो देवों को उनका रूप प्रदान कर देती है और तभी से अनुसूया “माँ सती अनुसूया” के नाम से प्रसिद्ध हुई।

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हर साल दिसम्बर के महीने में सती अनुसूया के पुत्र दत्तात्रेय की जयंती का आयोजन किया जाता है और इस महोत्सव के समय मेले का भी आयोजन किया जाता है। इस मेले को देखने के लिए दूर दूर से लोग आते है। इतना ही नहीं इसी पवित्र स्थान से पंच केदारो में से एक केदार “रुद्रनाथ” जाने का मार्ग भी बनता है। यहां अन्य प्रतिमाओं के साथ ही सती अनुसूया के पुत्र “दत्तात्रेय जी की त्रिमुखी” प्रतिमा भी विराजमान है। इस पवित्र मंदिर के दर्शन पाकर सभी लोग धन्य हो जाते हैं और इसकी पवित्रता सभी के मन में समा जाती हैं। सभी स्त्रियां मां सती अनुसूया से पवित्र होने का आशीर्वाद पाने की कामना करती हैं।

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