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कैसे हुआ तारा शक्तिपीठ का नाम ताराचंडी, जानिए पूरी कहानी

Maa Tara Chandi
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51 शक्तिपीठों में से एक है मां ताराचंडी धाम. बिहार के सासाराम से महज पांच कीलोमीटर की दूरी पर कैमूर की पहाड़ियों की गुफा में स्थित देवी का ये धाम अलौकिक है. मनमोहक प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर इस मंदिर के पास पहाड़, झरने व अन्य जल स्त्रोत हैं.

इस पीठ के बारे में किवदंती है कि सती के तीन नेत्रों में से श्री विष्णु के चक्र से खंडित होकर दायां नेत्र यहीं पर गिरा था, जो तारा शक्तिपीठ के नाम से विख्यात हुआ. मंदिर की प्राचीनता के बारे में कोई ठोस साक्ष्य लिखित रूप से नहीं है लेकिन मंदिर में स्थित शिलालेख से यह स्पष्ट होता है कि 11वीं सदी में भी यह देश के ख्यात शक्ति स्थलों में से एक था. कहा जाता है कि महर्षि विश्वामित्र ने इस पीठ का नाम तारा रखा था. दरअसल यहीं पर परशुराम ने मां तारा की उपासना की थी. मां तारा इस शक्तिपीठ में बालिका के रूप में प्रकट हुई थीं और यहीं पर चंड का वध कर चंडी कहलाई थी.

देखें ये वीडियो: कैसे हुआ तारा शक्तिपीठ का नाम ताराचंडी, जानिए पूरी कहानी

मंदिर का इतिहास !

मंदिर का इतिहास काफी पुराना है. मंदिर के गर्भगृह के समीप संवत 1229 का खरवार वंशीय राजा प्रताप धवल देव द्वारा ब्राह्मी लिपि में लिखवाया गया शिलालेख भी है, जो मंदिर की ख्याति व प्राचीनता को दर्शाता है. पुराणों, तंत्र शास्त्रों व प्रतिमा विज्ञान में मां तारा का चंडी जैसा रूप वर्णित है. उसी अनुसार सासाराम में दस महाविद्याओं में दूसरी मां तारा अवस्थित हैं.

मां तारा की प्रतिमा प्रत्यालीढ़ मुद्रा में बायां पैर आगे शव पर आरूढ़ है. कद में अपेक्षाकृत नाटी हैं, लंबोदर हैं व उनका वर्ण नील है. देवी के चार हाथ हैं, दाहिने हाथ में खड्ग व कैंची है, जबकि बाएं में मुंड व कमल है. कटि में व्याघ्रचर्म लिपटा है. मां तारा की मूर्ति कैमूर पहाड़ी की प्राकृतिक गुफा में अवस्थित है, जो पत्थर पर उत्कीर्ण है. गुफा के बाहर आधुनिक काल में मंदिर का स्वरूप दिया गया है. गुफा की ऊंचाई लगभग चार फीट है. गुफा के अंदर और बाहर की मूर्तियां पूर्व मध्यकालीन हैं.

पौराणिक कथाएं !

पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान शंकर जब अपनी पत्नी सती के मृत शरीर को लेकर तीनों लोकों में घूम रहे थे, तब संपूर्ण सृष्टि भयभीत हो गई थी. उस दौरान देवताओं के अनुरोध पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंडित किया था. जहां-जहां सती के शरीर के खंड गिरे उसे शक्तिपीठ माना गया. सासाराम का ताराचंडी मंदिर भी उन्हीं शक्तिपीठों में से एक है. कहा जाता है कि माता सती की तीसरी आंख इसी जगह गिरी थी, जिसे तारा के नाम से जाना जाता था और असुर चंड का वध करने के बाद ताराचंडी के नाम से विख्यात हुईं.

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मनोकामना सिद्ध देवी !

धाम पर शारदीय व चैत्र नवरात्र के अलावा सावन महीने में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ होती है. सावन महीने में यहां एक महीने का भव्य मेला भी लगता है. श्रावणी पूर्णिमा के दिन स्थानीय लोग देवी को शहर की कुलदेवी मान चुनरी कढ़ैया के साथ काफी संख्या में प्रसाद चढ़ाने धाम पर पहुंचते हैं. हाथी-घोड़ा व बैंडबाजे के साथ शोभायात्रा भी निकाली जाती है.

शारदीय नवरात्र में लगभग दो लाख श्रद्धालु मां का दर्शन-पूजन करने पहुंचते हैं. यहां देवी के नेत्र रूप की पूजा की जाती है. इस स्थान को मनोकामना सिद्ध देवी भी कहा जाता है. ऐसी मान्यता है सच्चे ह्रदय से मांगी गई हर मुराद देवी पूरा करती है, जिस वजह से भी देवी का धाम हमेशा भक्तों से भरा रहता है.

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