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मेजर शैतानसिंह के नाम से ही कांप उठे थे चीनी सैनिक, 1300 चीनी सैनिकों को उतारा मौत के घाट

Major Shaitan Singh Story
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Major Shaitan Singh Story: राजस्थान को वीर प्रसूता की धरती कहा जाता है। इस धरा पर रणबांकुरों का जन्म हुआ है। इस धरा पर एक से बढ़कर एक साहसी और तेजस्वी योद्धाओं ने जन्म लिया है, जिन्होंने रणभूमि में अपने रौद्र रूप से शत्रुओं को भयभीत किया है। ऐसे वीरों को जन्म देने वाली यह भूमि वीर प्रसूता है। आज हम आपको राजस्थान के एक ऐसे ही वीर योद्धा के बारें बताएंगे, जिसके आगे चीन की सेना थर-थर कांप उठी थी। चलिए जानते है 1962 में चीनी सैनिकों के सामने बहादुरी के साथ लड़ते हुए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले परमवीर चक्र विजेता मेजर शैतानसिंह भाटी (Major Shaitan Singh Story) की वीर गाथा के बारे में…

मेजर शैतानसिंह के नाम से ही कांप उठे थे चीनी सैनिक:

1962 के भारत-चीन युद्ध में देश के कई सैनिकों ने अपना बलिदान दिया। इनमें से ही एक थे मेजर शैतानसिंह भाटी। 1 दिसंबर 1924 को जोधपुर के फलोदी के पास शैतानसिंह भाटी का जन्म हुआ था। उनके पिता लेफ्टिनेंट कर्नल हेमसिंह भाटी ने प्रथम विश्व युद्ध में भाग लिया था। मेजर शैतानसिंह भी अपने पिता की तरह बचपन से ही बहादुर थे। पिता के नक़्शे कदम और देश भावना की कारण शैतानसिंह भी सेना में शामिल हो गए। शैतानसिंह को कुमायूं रेजिमेंट में शामिल किया गया था।

1300 चीनी सैनिकों का किया था डटकर मुकाबला:

बता दें मेजर शैतानसिंह के सामने चीनी सेना की बड़ी फौज थी। दूसरी तरफ उनके साथ भारतीय सेना के महज 114 सैनिकों साथ था। करीब 17 हजार फीट की उंचाई वाले चुशूल सेक्टर में दोनों देशों के सैनिक आमने-सामने हो गए। मेजर शैतानसिंह ने अपने 114 साथियों के साथ चीनी सेना के 1300 से ज्यादा सैनिकों को मौत के घाट उतारा दिया। इस दौरान मेजर शैतानसिंह भी घायल हो गए। कहा जाता है जब उनके हाथ काम नहीं कर रहे थे तब उन्होंने दुश्मनों को पांव से मशीनगन चलाई। उनके इस साहस और बलिदान की गाथा सुनकर आज भी लोग देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत हो जाते है।

मरणोपरांत परमवीर चक्र से नवाजा गया:

मेजर शैतानसिंह भाटी को अपने इस साहस और बहादुरी के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र से नवाजा गया। परमवीर चक्र का सम्मान शैतानसिंह को इसलिए दिया गया क्योंकि उन्होंने सिर्फ 114 जवानों के साथ 1300 चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतारकर देश की सीमा में दुश्मनों को घुसने नहीं दिया था।

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