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जोधपूर के मेहरानगढ़ की मां चामुंडा की क्यूं है अटूट मान्यता

Chamunda Maa
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जोधपूर के मेहरानगढ़ दुर्ग में स्थित माता चामुंडा का यह मंदिर बड़ा ही भव्य है। ऐसा कहा जाता है कि माता चामुंडा जोधपूर की रक्षक हैं। माता जोधपूर के लोगों पर किसी भी तरह का संकट नहीं आने देती हैं।

कहा जाता है कि साल 1965 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, जब पाकिस्तान ने अपने नापाक इरादों के साथ जोधपुर पर आक्रमण करना चाहा, तो माता ने चील का रूप धारण किया और जोधपुरवासियों की जान बचाई थी। तब से जोधपुर के लोगों में मां चामुंडा के प्रति और भी अटूट आस्था बन गई है। इसके साथ ही एक और मान्यता है कि साल 1857 में गोपाल पोल के पास रखे बारूद के ढेर पर बिजली गिरी थी, तो मंदिर के आस-पास सबकुछ ध्वस्त हो गया था, मगर माता की प्रतिमा को कुछ नहीं हुआ।

देखें ये वीडियो: मां चामुंडा की गुजरात में ये है महिमा

ऐसा कहा जाता है कि करीब साढ़े पाच सौ साल पहले जोधपुर नगर के संस्थापक राव जोधा ने चामुंडा माता की प्रतिमा मंडोर से लाकर स्थापित की थी।  चामुंडा देवी परिहार वंश की कुल देवी थी। माता की महिमा को देखकर राव जोधा देवी के भक्त बन गए। उन्होंने चामुंडा देवी को अपने वंशा की कुलदेवी मान लिया। वर्तमान मंदिर के स्वरूप का निर्माण महाराजा अजीत सिंह ने करवाया था। मारवाड़ के राठौड़ के वंशच चील को मां दुर्गा का स्वरूप मानते हैं। ऐसी मान्यता है कि राव जोधा को माता ने आशीर्वाद दिया था कि जबतक मेहरानगढ़ दुर्ग पर चीलें मंडराती रहेंगी, तबतक दुर्ग पर कोई भी संकट नहीं आएगा।

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आदिशक्ति मां चामुंडा के बारे में ऐसी मान्यता है कि वे देवी काली की अवतार हैं। उन्होंने चंड-मुंड नामक दैत्यों का संहार किया था। साथ ही बलशाली राक्षस अंधकासुर का भी नाश चामुंडा माता ने किया था। भारत की आजादी से पहले तक मंदिर में महिषासुर के प्रतिक भैंसे की बलि दी जाती थी, अब इस परंपरा पर रोक लगा दी गई है।

पूरे क्षेत्र में चामुंडा माता की अद्भूत शक्ति की गाथा सुनाई देती है। आज जोधपुर से बाहर शायद ही ऐसा गांव या शहर होगा, जहां चामुंडा माता की जागृत शक्ति से कोई इंकार करता होगा। यही वजह है कि नवरात्र के साथ-साथ आम दिनों में भी देश ही नहीं विदेशों से भी लोग बड़ी संख्या में माता का आशीर्वाद लेकर अपने मांगलिक कार्य का शुभारंभ करते हैं।

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