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पुण्यतिथि विशेष: महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की कहानियां आज भी ज़ेहन में अलग छाप छोड़ जाती हैं

Munshi premchand
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महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) की 85वीं पुण्यतिथि पर हर कोई उन्हें याद कर रहा है. उनकी कलम का जादू ऐसा था कि आज भी उनकी कहानियां लोगों के ज़ेहन में अलग छाप छोड़ जाती हैं. गबन, गोदान, कफन और ईदगाह जैसी कृतियों के रचनाकार मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) की हर कहानी उनके जीवन की तरह ही संघर्ष से भरी होती थी.

नवाब राय के नाम से लिखना किया था शुरू

31 जुलाई 1980 को वाराणसी के लमही गांव में जन्मे मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) का असल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था, ये बात तो शायद आप भी जानते होंगे लेकिन शायद ये ही बात आपको पता हो कि उन्होंने अपनी रचनाएं सबसे पहले नवाब राय के नाम से शुरू की थी, और उसके बाद प्रेमचंद के नाम से लिखते-लिखते इतने प्रसिद्ध हुए कि आज उनकी रचनाएं लोगों को उस वक्त के असल हालात से रूबरू करवाती हैं.

Munshi premchand

Image Courtesy: Google.com

ग्रामीण जीवन से रूबरू करवाती हैं रचनाएं  

एक ऐसी दृढ़ राष्ट्रवादी लेखक जिनकी लेखनी रंगभूमि और कर्मभूमि ने राष्ट्रवादी नेताओं को उनकी कमजोरियों का एहसास करवाया तो वहीं ग्रामीण जीवन से रुबरू करवाती उनकी कालजयी रचनाएं, जिनमें पूस की रात का हल्कु अपनी पत्नी से कंबल खरीदने की इच्छा व्यक्त करता है लेकिन साहूकार के कर्ज की बात याद आते ही उसके ख्वाब खत्म हो जाते हैं.

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प्रेमचंद की कालजयी रचनाएं

इसके अलावा गबन और गोदान जैसी कृतियां जिनके माध्यम से उन्होंने ये दिखाने की कोशिश की है कि कैसे कुछ खास तरह की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं से शोषण का जन्म होता है. गबन का नायक अपनी पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए पैसे की चोरी करता है फिर उसे पत्नी से दूर रहना पड़ता है. सिर्फ ग्रामीण जीवन ही नहीं बल्कि सदगति और सवा सेर गेहूं जैसी कृतियां पुरोहित परंपरा का घोर विरोध करती हैं. सोजे वतन जैसी पांच कहानियों की रचना जिस पर अंग्रेज सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था, उसके बाद से नवाबराय प्रेमचंद बन गए.  इस तरह से उनकी कई कृतियां आज भी अमर हैं, कालजयी हैं.  

ऊर्दू और हिंदी दोनों भाषाओं पर थी शानदार पकड़

यूं तो प्रेमचंद की शुरुआती शिक्षा फारसी में हुई, शायद यही वजह रही है कि उनका पहला लेख असरारे मआबिद रहा, और उसके बाद भी उन्होंने ऊर्दू साहित्य में कई उत्कृष्ट रचनाएं लिखी. कहते हैं कि मुंशी प्रेमचंद अपने दौर के एक ऐसी साहित्यकार थे जिनकी ऊर्दू और हिंदी दोनों भाषाओं पर पकड़ काफी शानदार थी. उनकी कहानियां अक्सर संघर्ष से भरी होती थीं.

Munshi Premchand

Image Courtesy: Google.com

संघर्षों भरा रहा प्रेमचंद का जीवन

उनके जीवन के संघर्षों की बात करें तो 7 साल की उम्र में उनकी माता का निधन हो गया और 16 साल की उम्र में उनके सिर से पिता का साया उठ गया. उससे पहले 15 साल की उम्र में ही उनकी शादी भी कर दी गई, बाद में उन्होंने दूसरी शादी एक ऐसी महिला से की जो बाल विधवा थीं, यानि सामाजिक कुरितियों के खिलाफ उन्होंने सिर्फ लेख ही नहीं लिखे बल्कि अपने जीवन में उन्होंने उन कुरीतियों को खत्म करने की कोशिश की है. उनके तीन बच्चे श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव हुए.  

सरकारी स्कूल में की शिक्षक की नौकरी

20 साल की उम्र में साल 1900 में प्रेमचंद (Munshi Premchand) ने एक सरकारी स्कूल में बतौर शिक्षक ज्वाइन किया, उस वक्त उनकी पगार 20 रुपये महीना थी, उसके बाद उनका तबादलाशुरुआती दिनों में उन्होंने बतौर शिक्षक नौकरी ज्वाइन की. हालांकि बाद में उन्होंने फिल्मों के लिए भी कहानियां लिखीं, इसके अलावा उन्होंने हंस और जागरण जैसी पत्रिकाएं भी निकालीं, साथ ही सरस्वती प्रेस खरीदी लेकिन प्रेस का व्यवसाय उनके लिए फायदे का नहीं रहा.

बेटे अमृत राय ने लिखी पिता की जीवनी

आखिरी समय में उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता गया, 8 अक्टूबर 1936 को उन्होंने आखिरी सांस ली. उनके बेटे अमृत राय ने कलम का सिपाही नाम से पिता की जीवनी लिखी, जिसके लिए साल 1963 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया.

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