Ott India News Logo
Recent Posts
Connect with:
Tuesday / October 4.
Homeनेचर एंड वाइल्ड लाइफइंसानी कोलाहल से कौनसे जीव को खतरा

इंसानी कोलाहल से कौनसे जीव को खतरा

noise
Share Now

समुद्रों में बढ़ते इंसानी शोर से जीवों के जीवन पर व्यापक असर पड़ रहा है. इस शोर (noise) से उनकी भोजन, प्रजनन और शिकारियों से बचने की क्षमता पर असर पड़ रहा है.  हवा की तुलना में शोर(noise) पानी में बहुत तेजी से दूर तक जाता है. यह बात समुद्री जीवन के लिए खतरा बन गई है. समुद्र में रहने वाले कई जीवों का विकास इस तरह से हुआ है कि वो अपने जीवन के कई पहलुओं के लिए अपने और अपने आसपास की ध्वनि पर निर्भर करते हैं. जिस तरह से समुद्री वातावरण में इंसानी शोर और कोलाहल घुल गया है. उसमें इन जीवों की आवाज गुम होती जा रही है जो उन जीवों के जीवन को खतरे में डाल रहा है.

अंतराष्ट्रीय जर्नल साइंस में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार इंसानों के कारण समुद्र में ध्वनि प्रदूषण बढ़ता जा रहा है. उसके शोर से प्राकृतिक ध्वनियों गुम होती जा रही हैं. जिसका असर छोटी झींगा से लेकर हजारों किलो वजनी व्हेल पर भी पड़ रहा है. इसे समझने के लिए इस शोध में 500 से भी ज्यादा शोधपत्रों का विश्लेषण किया गया है. जलवायु परिवर्तन और बढ़ता प्रदूषण वैसे भी समुद्रों और वहां रहने वाले जीवों पर व्यापक असर डाल रहा है.

यहाँ भी पढ़ें :प्लास्टिक के डब्बे में खाते है तो यह जानिए

इंसानी शोर (noise) के लिए बढ़ते जहाज,समुद्रों में तेल और गैस के लिए बढ़ती गतिविधियां और भूकंपीय सर्वेक्षण के लिए किया विस्फोट शामिल हैं. इन सभी ने मिलकर पानी के नीचे की आवाज को बहुत हद तक बदल दिया है. इसका असर व्हेल्स, डॉलफिन जैसे जीवों पर पड़ रहा है. कई बार यह जीव इस शोर (noise)से बहरे तक हो जाते हैं. यह जीव अपना पथ ढूंढने के लिए ध्वनि पर भरोसा करते हैं. ऐसे में इसके चलते यह अपने पथ से भी भटक जाते हैं.

noise

कई मछलियां और समुद्री जीव एक दूसरे से बात करने के लिए ध्वनि की मदद लेते हैं. Echolocation से ही सबकुछ पता लगता है पर ज्यादा आवाज से यह जीव Echolocation का उपयोग नहीं कर पाते. Echolocation की मदद से वो अपने लिए भोजन और प्रजनन के बेहतर स्थानों का पता लगाते हैं. इसके साथ ही ध्वनि की मदद से वो शिकारियों और आने वाले खतरे का पता लगाते हैं.  

क्या है इसका समाधान

ध्रुवीय महासागरों में ग्लेशियर के टूटने और समुद्र की सतह पर गिरने वाली बूंदों की आवाजों को समुद्र के नीचे काफी गहराई तक सुना जा सकता है. जलवायु परिवर्तन भी इन भौतिक प्रक्रियाओं जैसे हवाएं, लहरों और पिघलती बर्फ को प्रभावित करते हैं. जो समुद्री आवाजों को आकार देती हैं. ऐसे में इंसानी शोर और समुद्री जीवों विशेष रूप से समुद्री कछुओं, सरीसृपों, समुद्री पक्षियों, सील, वालरस आदि पर पड़ते प्रभाव पर नीति निर्माताओं को विशेष ध्यान देने की जरुरत है.

यहाँ भी पढ़ें : व्हेल कैसे बनी विश्व की सबसे विशालकाय मछली ?

जिससे इन जीवों को बचाया जा सके. इसके लिए अंतराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की टीम ने समुद्री शोर को मापने और उसके प्रबंधन के लिए वैश्विक नियम बनाने की बात कही है. अधिकतर इंसानी शोर को कम करना इतना मुश्किल भी नहीं है. उदाहरण के लिए जहाज के प्रोपेलर को कम आवाज करने वाला बनाया जा सकता है. ड्रिलिंग के लिए ऐसी तकनीक का उपयोग किया जा सकता है. जिससे कम से कम कम्पन हो और पानी में बुलबुले न बनें. इस तरह ध्वनि प्रदूषण को करीब आधा किया जा सकता है. इसी तरह रिन्यूएबल एनर्जी के उपयोग को बढ़ावा देने से तेल और गैस के लिए ड्रिलिंग करने की जरुरत कम हो जाएगी.

अधिक रोचक जानकारी के लिए डाउनलोड करें:- OTT INDIA App

No comments

leave a comment