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HomeकहानियांInternational Dog Day: ‘हचिको’ ने दी थी वफादारी की मिसाल, जानिए क्या थी कहानी

International Dog Day: ‘हचिको’ ने दी थी वफादारी की मिसाल, जानिए क्या थी कहानी

Hachiko
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आपने इंसान और जानवरों के बीच दोस्ती के कई मामले सुने होंगे. सालों से हम जानवरों को भी भगवान से जोड़ते हैं, जैसे गाय माता को कृष्ण से जोड़ते हैं.  महाभारत में भी एक वफादार कुत्ते की बात की जाती है. अगर हम कुत्ते की बात करें तो आज (International Dog Day) इंटरनेशनल डॉग है दिन 26 अगस्त को देश भर में कुत्ते प्रेमियों और संगठनों द्वारा यह दिन मनाया जाता है. 

आपने बिजनेसमैन रतन टाटा का डॉग लव तो देखा होगा, वो ट्वीट्स के जरिए अपने स्ट्रीट डॉग लव को भी दिखाते हैं. वहीं पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति मिशेल ओबामा भी अपने डॉगी के बारे में काफी कुछ शेयर करती थीं.

 

एक कहानी वफादारी की 

यह 1924 की कहानी है, जब रिज़ब्यूरो टोक्यो विश्वविद्यालय में कृषि विज्ञान के प्रोफेसर थे. वे एक कुत्ते की तलाश कर रहे थे. ऑडिट के शहर में पहुंचते ही इस प्रोफेसर के कुत्ते की तलाश पूरी कर ली गई है, जहां उसे एक पिल्ला मिला. धीरे-धीरे, कुत्ते और प्रोफेसर के बीच घनिष्ठ मित्रता विकसित हुई और प्यार इतना बढ़ गया कि जब प्रोफेसर काम पर जाने के लिए ट्रेन स्टेशन पर जाता तो कुत्ता उन्हें छोड़ने जाता. 

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हचिको अपने मालिक को हर दिन रेलवे स्टेशन ले जाता था
हाचिको डॉग और प्रोफेसर का यह प्यार घर में, पड़ोस में और साथ ही रेलवे स्टेशन में प्रसिद्ध हो गया. प्रोफेसर इनो हाचिको का अपना बेटा मानने लगे. हाचिको रोजाना सेंट्रल टोक्यो से शिबुया रेलवे स्टेशन पर अपने मालिक को लेने जाता था. फिर यह एक दैनिक दिनचर्या की तरह हो गया. 

21 मई, 1925 को हाचिको प्रोफेसर को ट्रेन स्टेशन पर छोड़ने गया, और वहीं बैठ कर उनकी वापसी की प्रतीक्षा कर रहा था, लेकिन प्रोफेसर वापस नहीं आया. प्रोफेसर इनो-सेरेब्रल हैमरेज से पीड़ित थे. यूनिवर्सिटी में लेक्चर के दौरान ब्रेन हैमरेज से प्रोफेसर की मौत हो गई. 

लेकिन हाचिको इस बात से अनजान था, इसलिए उसने हमेशा की तरह रेलवे स्टेशन पर अपने बॉस का इंतजार किया और वह नहीं आया. एक दिन, दो दिन … एक सप्ताह … उसका मालिक रेलवे स्टेशन पर नहीं आया. इसके बाद धीरे-धीरे लोगों में और रेलवे स्टेशन के आसपास यह बात फैल गई कि उस समय के प्रमुख समाचार चैनलों ने भी इस मामले की सूचना दी, अपने ही समाचार में हचिको डॉग की वफादारी का वर्णन किया. 

हाचिको ने लगभग 9 से 10 साल तक अपने गुरु का इंतजार किया, प्रोफेसर के जाने के बाद उनके गॉर्डनर ने हाचिको को गोद ले लिया, लेकिन प्रोफेसर और हाचिको के बीच प्यार इतना मजबूत था कि होचिको अपने मालिक को घर लाने का इंतजार कर रहा था. लेकिन वह जाता था और रेलवे स्टेशन पर बैठ जाता था. 

एक उम्मीद है कि मालिक आएगा

सुबह-शाम बस  हाचिको ट्रेन को आते-जाते देखता है, होचिको बस उम्मीद थी कि आज मैं अपने बॉस से मिलूंगा, वह वापस आएगा, मैं उसके साथ खेलूंगा… मैं घर जाऊंगा… लेकिन ऐसा कुछ नहीं है हुआ. 9 साल हो गए हैं जब एक प्रमुख जापानी अखबार ने इस वफादारी पर ध्यान दिया और हचिको को नोटिस करना शुरू किया तो हाचिको लोकप्रिय हो गया, लोगों ने प्यार से हचिको को ‘चुकेन-हाचिको’ कहा. 

हाचिको पूरे देश में वफादारी का प्रतीक बन गया
हचिको की वफादारी के लिए भी सम्मानित किया गया था और टोक्यो विश्वविद्यालय में हाचिको नामक एक प्रोफेसर और कुत्ते की एक मूर्ति लगाई गई थी. 

इस वफादारी की मान्यता में, 1934 में शिबुया रेलवे स्टेशन पर हचिको की एक कांस्य प्रतिमा बनाई गई थी. लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सेना को कांसे की जरूरत थी, इसलिए हचिको की प्रतिमा को छानकर इस्तेमाल किया गया, लेकिन 1948 में हचिको की प्रतिमा का पुनर्निर्माण किया गया. 

हचिको की यह प्रतिमा रेलवे स्टेशन के प्रवेश द्वार के पास खड़ी है, प्रतिमा का नाम “हचिको-गुची” है. तुम्हें पता है इस नाम का एक सुंदर अर्थ भी है, हचिको प्रवेश/निकास. यह शिबुया रेलवे स्टेशन पर नंबर 5 निकास में से एक है. 

हाचिको ने दुनिया को कहा अलविदा

9 साल, 9 महीने और 15 दिनों के इंतजार के बाद, 8 मार्च, 1935 को हाचिको की टर्मिनल कैंसर से मृत्यु हो गई.  हाचिको अपनी मृत्यु के समय भी रेलवे स्टेशन के आसपास ही था.  हाचिको का मकबरा प्रोफेसर इनो के मकबरे के बगल में बनाया गया था. 

 

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