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Homeनेचर एंड वाइल्ड लाइफकबूतर को आप दोस्त समझ रहे हो, वो हो सकता है आपका सबसे बड़ा दुश्मन

कबूतर को आप दोस्त समझ रहे हो, वो हो सकता है आपका सबसे बड़ा दुश्मन

Pigeon
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पक्षी जिसे आप रोज खाना खिलाते है वो आपकी मौत बन सकता है. जिसे पूराने समय में संदेशावाहक के तौर पर बड़े मान से नवाजा जाता था. आज वही पंछी इंसानों की वजह से बन गया है एक कातिल. बात है आपके घर और दफ्तर के पास रहने वाले (Pigeon) कबूतर की. जिसे भारत में सभी भली भांति जानते हैं.  

पक्षियों में कबूतर को शांति का प्रतीक माना जाता है, शहर के किसी न किसी कोने में कबूतरों को दाना डालते हुए लोग देखे जा सकते हैं. लेकिन इन्हीं कबूतरों के करीब रहने पर आपको कई जानलेवा बीमारियां (Diseases Caused by Pigeon) हो सकती हैं.

photo of flock of pigeon eating seeds

लोग कबूतरों से पैदा होने वाली खतरनाक बीमारियों से बेपरवाह हैं, कबूतरों (Pigeon) की आवाजाही से लोग परेशान हैं, लेकिन ये नहीं जानते कि ये सिर्फ तंग करने वाला पंछी नहीं बल्कि ऐसा पंछी है जिसकी बीट(मल) और पंख आपको बीमार, बहुत बीमार बना सकते हैं.

कबूतरों पर शोध में एक बड़े खतरे के संकेते मिले है. कबूतर के मल में से ऐसे इंफेक्शन होते हैं जो आपके फेफड़ों को खासा नुकसान पहुंचाते हैं और आपको जल्दी इनका पता भी नहीं चलता है. अगर आपके घर में लगे AC के आसपास कबूतरों ने घोंसला बनाया है तो यह खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

what do pigeons eat

कबूतरों (Pigeon) की उनके मल पर बैठने की आदत होती है. और यही से शुरू होता है बीमार करने का सफर. जब (Pigeon) कबूतर अपने मल पर बैठते है तो वो पाउडर के पास बैठकर अपने पंख फड़फड़ाते हैं. और यही पाउडर हवा में छोटे-छोटे कण बनकर बिखर जाता हैं. जो हवा के जरीए इंसान के फेफड़ो तक पहुंचता है. शोध से पता चला है कि कबूतरों के मल(बीट) से कई बीमारियां पैदा हो सकती हैं.

रिसर्च में हुआ खुलासा

प्रोफेसर वी वासुदेव राव की रिसर्च के मुताबिक, एक कबूतर एक साल में 11.5 किलो बीट करता है. बीट सूखने के बाद उसमें परजीवी पनपने लगते हैं. बीट में पैदा होने वाले परजीवी हवा में घुलकर संक्रमण फैलाते हैं. इस संक्रमण की वजह से कई तरह की बीमारियां होती हैं. कबूतर और उनकी बीट के आसपास रहने पर इंसानों में सांस लेने में तकलीफ, फेफड़ों में इन्फ़ेक्शन, शरीर में एलर्जी हो सकती है.

कबूतर से होने वाली काफी सारी बीमारी फेफड़ों से जुड़ी हो सकती हैं, जिसको हम हाइपर सेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस नाम से जानते हैं. जिसमें लंग्स का एलर्जिक रिएक्शन होता है. कबूतर की ड्रॉपिंग से फंगल डिज़ीज़ भी हो सकती हैं. अगर वक्त रहते बीमारियां पकड़ में न आएं तो किसी मरीज़ के लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं.

pigeon eating

डोक्टर्स के मुताबिक कबूतरों से होने वाली ये बीमारियां कबूतरों की संख्या के साथ हर साल बढ़ती जा रही हैं. शायद इसीलिए कबूतरों से होने वाली हाइपर सेंसिटिविटी के मरीज़ों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है.

विश्व के कई देशों में कबूतरों को दाना डालने पर बैन हैं. 2001 में लंदन के ट्राफलगर स्क्वायर में कबूतरों को दाना डालने पर बैन लगा दिया गया था. वेनिस ने 2008 में सेंट मार्क स्क्वायर पर पक्षियों के लिए खाना बेचने वालों पर जुर्माने का प्रावधान कर दिया था. जबकि कुछ साल पहले कैटेलोनिया में कबूतरों को ओविस्टॉप नामक गर्भनिरोधक दवा खिलानी शुरू कर दी गई थी.

भारत में बढ़ती कबूतरों की संख्या एक खतरे की घंटी है. भारत के कौने-कौने में लोग दान करने के नाम पर कबूतरों को दाना डालते है, जिससे कबूतरों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है. तो साथ में कबूतरों की ड्रोपिंग भी बढ़ रही है. जिससे लोगों को पता भी नहीं चलता और वो बीमार होते जा रहे है.

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क्या है समाधान

भारत में सार्वजनिक एवं सभी जगहों पर कबूतरों या दूसरे पक्षियों को दाना डालने पर प्रतिबंध लगाना चाहिए. इस नियम का उल्लंधन करनेवाले व्यक्ति पर भारी जुर्माना एवं जैल की सजा का प्रावधान होना चाहिए. कबूतरों की संख्या को नियंत्रत करने के लिए गर्भनिरोधक दवा के साथ-साथ दूसरे उपाय भी करने चाहिए. जिससे कबूतरों से होने वाली बीमारियों को रोका जा सके और भयंकर बीमारियों को टाला जा सके.    

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