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Raksha Bandhan History: जब भगवान इंद्र को अपनी ही पत्नी से बंधवानी पड़ी थी राखी

Raksha Bandhan History
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Raksha Bandhan History: रक्षाबंधन का त्यौहार हमारे भारतवर्ष के जन मानस में रचा और बसा है। ये पर्व कोई आज का नहीं अपितु युगो-युगांतर से मनाया जा रहा है। इस त्यौहार (Raksha Bandhan History) का महत्व धार्मिक, पारिवारिक और सामाजिक तीन रूप से महत्वपूर्ण और लाभकारी है। भाई-बहन का यह त्योहार हर साल सावन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है। रक्षा बंधन का पर्व 22 अगस्त दिन रविवार को मनाया जाएगा। आज हम आपको बताएंगे रक्षाबंधन के त्यौहार से जुड़ी दो पौराणिक कथाएं.. 

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इंद्र को अपनी ही पत्नी से क्योँ बंधवानी पड़ी थी राखी:

सतयुग में जब देवताओं के मध्य भयानक संग्राम हो रहा था तो देवताओं के राजा इंद्र युद्ध के लिए वृतासुर नामक दैत्य को ललकारा। तब भगवान इंद्र की पत्नी देवी सचि ने अपने पति के रक्षा हेतु अभिमंत्रित करके उनके कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था। जिसके कारण इंद्र व सभी देवता देवासुर संग्राम में विजय हुए। तब से रक्षा हेतु कलाई पर सूत्र बांधने का प्रचलन चलता आ रहा है।

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भगवान विष्णु को लेना पड़ा था वामन अवतार:

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार दैत्यों के राजा बलि ने अपने पूर्वजों का बदलना लेने के लिए स्वर्ग पर चढाई कर दी थी। इन्द्राधिक देवता युद्ध हार गए। स्वर्ग पर अधिपत्य अब राजा बलि का था। फिर देवताओं ने पुनः स्वर्ग पर अधिकार पाने के लिए भगवान नारायण को प्रसन्न किया। जब राजा बलि को इस बात का ज्ञात हुआ तो बलि ने अपने आयुष्य मेध यज्ञ का आयोजन किया। उस आयुष्य मेध यज्ञ में ऋषियों, मुनियों और देवताओं सहित भगवान लक्ष्मी नारायण भी पधारे।

राजा बलि ने इस प्रकार किया था भगवान लक्ष्मी नारायण को प्रसन्न:

राजा बलि ने सभी का अर्घ आचमन पंचविधि के साथ भगवान लक्ष्मी नारायण का पूजन किया। बलि के इस तरह शास्त्रोत और धार्मिक विचार व कर्म से भगवान लक्ष्मी नारायण प्रसन्न हुए। तब उन्होंने बलि से कहा की वरदान मांगो। तब राजा बलि ने कहा अभी हम यज्ञ शामिल है, अभी कुछ मांग नहीं सकता। क्योंकि वैदिक पद्त्ति का नियम है कि यजमान यज्ञ में शामिल होने के बाद केवल दान कर सकता है। कुछ मांग नहीं सकता।

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अपितु अगर कुछ आपको देना ही है तो मेरे यज्ञ की रक्षा और विधि को पूर्ण करने में सहायता करें। भगवान लक्ष्मी नारायण ने राज बलि को तथास्तु कह दिया। और एक दिव्य रक्षा सूत्र माता लक्ष्मी ने राजा बलि के हाथ पर बांध दिया। और कहा जब तक ये अक्षय रक्षा सूत्र तुम्हारे हाथों में रहेगा तब तक तुम इस संसार के सबसे बड़े दानी कहे जाओगे। बाद में उस रक्षा सूत्र का प्रभाव इस तरह हुआ।

देवताओं के कहने पर भगवान विष्णु ने वामन अवतार धर कर जब बलि से तीन पग भूमि मांगी थी, तो राजा बलि ने निसंकोच उस दान को पूरा किया था। वो उसी रक्षा सूत्र का प्रभाव था की राजा बलि ने भगवान वामन को प्रसन्न किया। भगवान ने प्रसन्न होकर राजा बलि से कहा कि हम तुम्हे पाताल लोक का राजा बनाते है और हम तुम्हारे द्वारपाल कि तरह रहेंगे।

रक्षा सूत्र बांधने का मंत्र:

तब से रक्षा सूत्र मनाने का मंत्र इस प्रकार है: येन बद्धो बलि राजा,दानवेन्द्रो महाबल: तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:।’ इस पौराणिक मंत्र का अर्थ है- जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षाबंधन से मैं तुम्हें बांधता हूं, जो तुम्हारी रक्षा करेगा।

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(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारियों पर आधारित हैं। OTT India इनकी पुष्टि नहीं करता है। इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें)

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