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Homeकहानियां‘दरबारी कवियों’ के दौर में भला दिनकर की याद न आए ये कैसे हो सकता है! पढ़ें राष्ट्रकवि के बारे में

‘दरबारी कवियों’ के दौर में भला दिनकर की याद न आए ये कैसे हो सकता है! पढ़ें राष्ट्रकवि के बारे में

Ramdhari Singh Dinkar
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दरबारी कवियों के दौर में दिनकर की याद न आए ऐसा हो ही नहीं सकता. दिनकर ऐसे कवि थे जिनकी कलम सिर्फ सच लिखती थी, वो भी ऐसा सच जिसे सुनकर आप थोड़ी देर के लिए हतप्रभ रह जाएंगे. आजादी से पहले ‘विद्रोही कवि’ और आजादी के बाद राष्ट्रकवि के रूप में जाने जाने वाले रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar) की एक-एक रचना रग-रग में जोश भर देती है. हालांकि आज सच लिखने वाले बेहद गिने-चुने ही लोग बचे हैं. 

23 सितंबर 1908 को बिहार के बेगुसराय जिले में जन्मे रामधारी सिंह दिनकर ने राजनीतिक विज्ञान में स्नातक (बीए) की डिग्री ली. स्नातक के बाद ही रामधारी सिंह दिनकर एक स्कूल में अध्यापक बन गए.

स्वतंत्रता आंदोलन में लिया हिस्सा

हालांकि उससे पहले साल 1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया तो उसके खिलाफ राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन हो रहे थे, उसमें दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar) ने भी हिस्सा लिया था. कहते हैं कि शुरुआत से ही उनका रुझान कविताओं के प्रति था, उनकी पहली कविता साल 1924 में छात्र सहोदर नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुई थी. उसके बाद तो कारवां चलता गया, बारदोली सत्याग्रह पर भी दिनकर ने कई कविताएं लिखीं. हालांकि ऐसा कहा जाता है कि अंग्रेजी सरकार की वजह से दिनकर की कविताएं अमिताभ के नाम से छापी गईं.

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1952 से 1964 तक रहे राज्यसभा सांसद

साल 1934 में बिहार सरकार में कई पदों पर काम किया और देश आजाद होते ही बिहार के एक विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष नियुक्त हुए. उसके बाद बिहार छोड़कर दिनकर साहब देश की राजधानी दिल्ली पहुंच गए. साल 1952 से लेकर 1964 तक रामधारी सिंह दिनकर राज्यसभा सांसद रहे. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें राज्यसभा के लिए चुना था लेकिन कहते हैं कि रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar) ने कभी इस बात का ख्याल नहीं रखा बल्कि नेहरू की नीतियों की खूब मुखालफत की.

Dinkar

Image Courtsey:Google.com

नेहरू की नीतियों का विरोध

साल 1962 के युद्ध में जब भारत की चीन से हार हुई तो उस वक्त सदन में रामधारी सिंह दिनकर ने दो ऐसी लाइन कही थी, जिससे सदन में मौजूद नेताओं का सिर झुक गया था. दिनकर ने कहा था ‘रे रोक युद्धिष्ठिर को न यहां, जाने दो उनको स्वर्गधीर, फिरा दे हमें गांडीव गदा, लौटा दे अर्जुन भीम वीर’. इसके अलावा हिंदी शब्द के अपमान को लेकर सदन में दिनकर ने नेहरू की ओर से इशारा करते हुए कहा था कि क्या आपने हिंदी को इसलिए राष्ट्रभाषा चुना ताकि देश के 16 करोड़ हिंदीभाषियों को रोज अपशब्द सुनाएं. ऐसे कई वक्त आए जब रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी कलम से वो कल्पनाएं लिखी जो सच थी, यही वजह रही कि वो दरबारी कवियों तरह नहीं बल्कि राष्ट्रकवि के रूप में प्रसिद्ध हुए.

रामधारी सिंह दिनकर को मिले सम्मान

साल 1959 में संस्कृति के चार अध्याय रचना के लिए रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar) को साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसी साल तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने राष्ट्रकवि दिनकर को पद्म विभूषण से सम्मानित किया. साथ ही साल 1972 में काव्य रचना उर्वशी के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला. 1999 में भारत सरकार ने उनकी याद में डाक टिकट भी जारी किया था. आज भी राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर लोगों की यादों में जिंदा हैं, आज भी कुरुक्षेत्र, उर्वशी, रश्मिरथी और परशुराम की प्रतिक्षा जैसी उनकी रचनाएं पढ़कर लोग जोश और उमंग से भर उठते हैं.

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