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खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी!

Rani LaxmiBai
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय बहादुर महिलाओं का भी महत्वपूर्ण योगदान है। इन वीरांगनाओं के शौर्य और पराक्रम की चर्चा इतिहास में उल्लेखित है। आज हम ऐसी ही एक वीरांगना के बारे में जानेंगें। जिनकी वीर गाथाओं को हम बचपन से सुनते आ रहे हैं, पढ़ते आ रहे हैं। यहाँ तक कि उनकी वीरगाथाओं को टेलीविजन में और बड़े पर्दे पर भी उनके इतिहास को फिल्माया जा चुका है। वो वीरांगना कोई और नहीं बल्कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई हैं। 

महारानी लक्ष्मीबाई की वीरता, शौर्य और साहस को तो हम सभी बहोत अच्छे से जानते हैं। तो आइए, लक्ष्मीबाई (Rani of Jhansi- Rani Laxmibai) की 165 वीं पुण्यतिथि पर एक बार फिर से इतिहास के पन्नों को पलटकर उनकी वीरता को सलाम करते हैं।  

1857 की महान क्रांति में रानी लक्ष्मीबाई की कहानी प्रेरणादायक:- 

  • जन्म 19 नवंबर, 1828
  • मृत्यु: 18 जून 1858 

महारानी लक्ष्मीबाई ने 1857 की महान क्रांति में बहोत बड़ा योगदान दिया है। साहस और शौर्य की वीरांगना से 1857 के सितंबर-अक्टूबर माह के दौरान हुए युध्द में उन्होंने बड़ी बहादुरी से लड़ते हुए अपने पुत्र दामोदर राव को पीठ पर बांधकर बड़े कौशल से युद्ध को लड़ा था। और अपने राज्य झांसी को दो पडोसी राज्यों, ओरछा और दतिया की सेनाओं से पराजित होने से बचाया था। जनवरी 1858 में जब ब्रिटिश आर्मी ने झांसी पर आक्रमण किया तब युद्ध पूरे दो सप्ताह तक लगातार युद्ध चला था। और ब्रिटिश सेना झांसी शहर को पूरी तरह से नष्ट करने में सफल रही। इसके बाद रानी लक्ष्मीबाई की  मुलाकात तात्या टोपे से हुई। फिर उन्होंने दोबारा अंग्रेजों के साथ युद्ध लडने का निर्णय लिया। इसी संघर्ष में 17 जून 1858 को वह ग्वालियर की रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुईं और विश्व इतिहास में भारतीय नारी की ओजस्विता की प्रतीक बन गंई। 

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Image Credit: Google Image

इन वीरांगना के बारे में भारत की महान कवित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने बहोत अच्छे तरीके से उनकी वीरता को एक कविता में पिरोया है। 

झांसी की रानी की कहानी सुभद्राकुमारी चौहान के जुबानी:- 

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

रानी लक्ष्मीबाई को सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी सम्मान दिया गया। उनका बहुचर्चित नारा “मैं अपनी झांसी नहीं दूँगी”। इस तरह से देश की वीरांगना ने अपने जीवन को अपने राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया था।

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Rani Laxmibai

Image Credit: Google Image

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़।

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में।

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1828 को हुआ था। वह अपने माता-पिता की वें इकलौती संतान थीं। उनका प्रिय नाम मनु था, उनके माता-पिता प्यार से उन्हें मनु पुकारकर बुलाते थे। मात्र चार वर्ष की उम्र में ही उनकी माता का देहांत हो गाय था। उनकी परवरिश पिता की क्षत्रछाया में हुई। और मनु ने बचपन से ही तलवार चलाने का कौशल सीख लिया था। तलवारबाजी के अलावा घुडसवारी एवं धनुर्विद्या का विधिवत प्रशिक्षण लिया था। 

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Image Credit: Google Image

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?
जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
‘नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’।

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

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Image Credit: Google image

मनु/रानी लक्ष्मी बाई का विवाह छोटी सी उम्र में झांसी के राजा गंगाधर राव के साथ हुआ था। उनकी शादी के बाद झांसी की आर्थिक परिस्थितियों में कई सुधार हुए। शादी के बाद मनु का नाम लक्ष्मीबाई रखा गया था। शादी के कुछ वर्ष पश्चात लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका चार महीनों में ही निधन हो गया था। रानी ने दामोदर राव को गोद लिया। राजा गंगाधर भी अत्यधिक बीमार रहने लगे और अत्यधिक दिन तक जीवित नहीं सके और जल्दी ही उनकी मृत्यु हो गई। 

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कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

इस तरह रानी पर एक के बाद मुसीबतों काअ पहाड टूट पड़ा लेकिन वें गभराई नहीं, बल्कि डटकर सामना किया। वहीं अंग्रेजों ने दत्तक पुत्र को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया था। डलहौजी की राज्य हड़प नीति के तहत ब्रिटिश शासन ने झांसी को अपने राज्य में मिलाने का निश्चय कर लिया था। 

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Image Credit: Hindipanda

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥ 

इस तरह लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों की शर्ते मानने से इनकार कर दिया और अंग्रेजों से युद्ध का करने का  फैसला लिया था। 1857 के संग्राम में झांसी एक प्रमुख केंद्र के रूप में बाहर आया। रानी लक्ष्मीबाई ने बहुत ही कम उम्र में ही साबित कर दिया कि वह न सिर्फ बेहतरीन सेनापति हैं बल्कि कुशल प्रशासक भी है। 

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रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

महारानी लक्ष्मीबाई ने महिला सेना का निर्माण किया। और महिलाओं को अधिकार संपन्न बनाने की भी अग्रिम थीं। इस तरह से नारी शक्ति का मोर्चा तैयार किया। और महिला सशक्तिकरण (women’s empowerment) को आगे बढ़ाया गया। आज भी महारानी लक्ष्मीबाई को एक वीरांगना की तरह हम याद करते हैं। उनकी विरगाथा की कहानियों को जिनती बार सुनो उतना कम है। 

ऐसी ही रोचक कहानियाँ आपके समक्ष हम लाते रहेंगे। तब तक के लिए देश और दुनिया की खबरों के लिए बने रहें OTT INDIA पर.. स्वस्थ रहें। 

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