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Homeभक्तिमहाबलशाली रावण को भी कभी बनना पड़ा था बंदी, पढ़ें भगवान शिव ने कैसे करवाया था रावण को मुक्त

महाबलशाली रावण को भी कभी बनना पड़ा था बंदी, पढ़ें भगवान शिव ने कैसे करवाया था रावण को मुक्त

ravana
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लंकापति रावण(Ravana) जिसने कई देवताओं को उसने अपने घर में बंदी बनाकर रखा था, जिसके चलने से धरती हिलती थी और स्वर्ग में देवता भी डरते थे. उस घमंडी रावण की जिंदगी में एक समय ऐसा भी आया जब सहस्त्रार्जुन(Sahshtrarjun) के साथ युद्ध में उसे न सिर्फ हार का सामना करना पड़ा बल्कि उसे बंदी बनना पड़ा. ये जानकर आपको आश्चर्य होगा कि भगवान शिव(Lord Shiva) ने रावण को बंधन से मुक्त करवाया था.

पौराणिक कथा के मुताबिक एक बार सहस्त्रार्जुन जिसकी हजार भुजाएं थी अपनी रानियों के साथ नर्मदा नदी के किनारे अठखेलियां कर रहा था, इसी दौरान एक रानी के कहने पर सहस्त्रबाहु ने अपने हाथ फैलाकर नर्मदा के बहाव को रोक दिया, जिससे कुछ ही दूरी पर भगवान शिव की पूजा में लीन रावण की पूजन सामग्री बह गई. उसके बाद अभिमानी रावण(Ravana) ने क्रोधित होकर ऐसा करने वाले को दंड देने के बारे में सोचा और उससे युद्ध करने लगा.

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Images Courtesy: Google.com

सहस्त्रार्जुन ने रावण को बनाया बंदी

हजार भुजाओं वाले सहस्त्रार्जुन और रावण(Sahshtrarjun-Ravana Yudh) के बीच भीषण युद्ध हुआ लेकिन रावण की इसमें हार हुई और उसे बंदी बनना पड़ा. यहां तक कि उसे बंदी बनाकर सहस्त्रार्जुन ने कारागार में बंद कर दिया. वहां रावण ने अपने इष्टदेव भगवान शिव को याद किया तो वहीं दूसरी ओर भगवान शिव ने अपने शिष्य परशुराम(Parshuram) को अपने पास बुलाकर कहा कि हमने तुमसे गुरु दक्षिणा नहीं ली है, अब गुरु दक्षिणा देने का समय आ गया है.

भगवान भोले के आदेश पर करवाया मुक्त

ऐसा सुनकर परशुराम बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि प्रभु आप आदेश करें, जिस पर भगवान शिव ने कहा कि तुम्हारी तरह ही एक और मेरा भक्त मृत्युलोक में है, जिसका नाम रावण है. वह इस वक्त सहस्त्रार्जुन के कारागार में बंदी है, तुम उसे कारागार से मुक्त करवाओ क्योंकि उसे अपने अभिमान की सजा मिल चुकी है. बता दें कि ये भगवान का ही रचाया हुआ खेल था कि रावण(Ravana) ने घमंड में आकर युद्ध के बारे में सोचा और फिर उसे पराजय का सामना करना पड़ा.

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Image Courtesy: Google.com

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फिर भी रावण का घमंड नहीं हुआ खत्म

भगवान भोले के आदेश पर परशुराम ने रावण(Ravana) को कारागार से मुक्त करवाया, हालांकि उसके बाद भी उसका घमंड खत्म नहीं हुआ. बल्कि एक बार तो जब माता पार्वती और भगवान शिव कैलाश पर्वत पर बैठे थे तो रावण ने कैलाश पर्वत को ही उठाने की कोशिश की. यहां तक कि पूछने पर उसने कहा कि सब गुरु के चरण छूते हैं लेकिन मैं गुरु को शिरोधार्य करना चाहता हूं.

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