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Pandit Deendayal Upadhyaya की जयंती पर जानिए उनके जीवन और संघर्षों से जुड़ी कहानी

Pandit Deendayala Upadhyaya
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पंडित दीनदयाल उपाध्याय (Pandit Deendayal Upadhyaya) एक ऐसा नाम है जो दार्शनिक, समाजशास्त्री और राजनीतिज्ञ थे. जिनकी विचारधाराओं ने जनसंघ को नई ऊंचाई देने में अहम भूमिका निभाई, जिनके प्रेरणादायक विचारों का आज भी पीएम मोदी से लेकर बीजेपी के तमाम नेता अनुसरण करते हैं. पंडित दीनदयाल उपाध्याय (Pandit Deendayal Upadhyaya) की 105वीं जयंती को बीजेपी अलग ढंग से मना रही है. साल 2017 से उनकी जयंती को अंत्योदय दिवस के रूप में भी मनाया जा रहा है, जिसका मतलब है समाज के आखिरी पंक्ति में खड़े आखिरी व्यक्ति का उदय/विकास.

25 सितंबर 1916 को उत्तर प्रदेश के नगला चंद्रभान (मथुरा) में जन्मे पंडित दीनदयाल उपाध्याय (Pandit Deendayal Upadhyaya) के जीवन में संघर्षों का दौर बचपन से ही शुरू हो गया था. मात्र तीन साल की उम्र में ही दीनदयाल के सिर से पिता का साया उठ गया. पिता की मौत के बाद मां की तबीयत भी खराब रहने लगी, दीनदयाल जब 7 साल के हुए तो उनकी माता का भी देहांत हो गया. 7 साल की उम्र में ही माता-पिता को खोने का दर्द महसूस करने वाले दीनदयाल का बचपन बिल्कुल वीरान हो गया. हालांकि उन्होंने एमए फर्स्ट ईयर तक अपनी पढ़ाई पूरी की. अपने मामा के आग्रह पर उन्होंने प्रशासनिक परीक्षा दी और पास कर गए लेकिन अंग्रेजों के अधीन नौकरी नहीं की.

Pandit Deendayal Upadhyaya

Image Courtesy: Google.com

‘दो दीनदयाल मिल जाएं तो राजनीति का नक्शा बदल दूं’

हालांकि कॉलेज के दिनों में ही दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विचारों से ओत-प्रोत हो चुके थे. साल 1942 के बाद पूरी तरह से उनका मन आरएसएस में रम गया. उसके बाद तो कई जगहों पर जाकर उन्होंने संघ का प्रचार किया. कहते हैं कि साल 1951 में जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना की तो उस वक्त दीनदयाल उपाध्याय भी काफी बड़े नेता थे. खुद श्यामा प्रसाद मुखर्जी कहा करते थे कि अगर दो दीनदयाल उपाध्याय मिल जाएं तो भारतीय राजनीतिक का नक्शा बदल दूं.

मुगलसराय स्टेशन पर मिली थी लाश

साल 1952 में हुए भारतीय जनसंघ के कानपुर अधिवेशन में श्यामा प्रसाद मुखर्जी महामंत्री बने और करीब 15 साल तक साल 1967 तक उन्होंने अपने पद की बखूबी जिम्मेदारी निभाई. पंडित दीनदयाल उपाध्याय की राष्ट्रधर्म, पांञ्चजन्य और स्वदेश जैसी पत्र-पत्रिकाओं को शुरू करवाने में बड़ी भूमिका रही है. साल 1967 में जब कालीकट का अधिवेशन आयोजित हुआ तो दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ के अध्यक्ष चुने गए, पर ज्यादा दिनों तक पंडित दीनदयाल उपाध्याय (Pandit Deendayal Upadhyaya) अध्यक्ष के पद पर नहीं रह सके. 10-11 फरवरी 1968 की रात मुगलसराय स्टेशन पर उनकी लाश मिली.

Pandit Deendayal Upadhyaya Junction

Image Courtesy: Google.com

आज भी यादों में जिंदा हैं पंडित दीनदयाल उपाध्याय

जिसे सुनकर पूरे देश में शोक की लहर फैल गई, हर कोई जांच की मांग कर रहा, आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग की जा रही थी. बाद में सीबीआई की जांच हुई तो ट्रेन से धक्का दिए जाने की थ्योरी भी सामने आई, लेकिन अब तक मौत की असल वजह सामने नहीं आ पाई है. हालांकि अब मुगलसराय रेलवे जंक्शन का नाम बदलकर दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन (Deendayal Upadhyaya Railway Junction) कर दिया गया है.

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Pandit Deendayal Upadhyaya Port

साथ ही कांडला बंदरगाह का नाम भी पंडित दीनदयाल उपाध्याय (Deendayal Upadhyaya Port) के नाम पर रखा गया है. इसके अलावा और भी कई योजनाओं के नाम पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर रखे गए हैं, जिनमें दीनदयाल अंत्योदय योजना, दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, दीनदयाल उपाध्याय श्रमेव जयते कार्यक्रम और दीनदयाल उपाध्याय किसान कल्याण योजना समेत कई योजनाएं शामिल हैं. आज भी दीनदयाल उपाध्याय लोगों की यादों में जिंदा हैं.  

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