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सप्तश्रृंगी माता का ऐसे रखा गया महिषासुरमर्दिनी नाम, जानिए क्या है पूरी कहानी

Saptashrungi Shaktipeeth
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वो सात पर्वतों की देवी हैं। भक्त उन्हें सप्तश्रृंगी माता के नाम से पुकारते हैं। सात छोटे-बड़े पर्वतों के बीच स्थित यह मंदिर माता सप्तश्रृंगी का है।  पुराणों के अनुसार सप्तश्रृंगी देवी को ब्रह्स्वरूपिणी के नाम से भी जाना जाता है।  ऐसी भी मान्यता है कि ब्रह्म देव के कमंडल से निकली गिरिजा महानदी देवी सप्तश्रृंगी का ही रुप है। शास्त्रों के हिसाब से माता सप्तश्रृंगी की महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के त्रिगुण रूप में भी पूजा-अर्चना की जाती है।

माता सप्तश्रृंगी की अर्धशक्तिपीठ के रूप में होती है पूजा

भगवत कथा के अनुसार भारतवर्ष में 108 शक्तिपीठ हैं। इनमें अर्धशक्तिपीठ भी शामिल हैं। इस मंदिर में माता  की अर्धशक्तिपीठ के रूप में आराधना की जाती है। पहाड़ों के बीच स्थित यह मंदिर महाराष्ट्र के नासिक जिले से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

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मान्यता

ऐसी मान्यता है कि यहां एक वर्ष में माता सप्तश्रृंगी के दो रूप दिखाई दते हैं। चैत्र नवरात्र में माता प्रसन्न मुद्रा में होती हैं, तो वहीं अश्विन नवरात्र में उनकी मुद्रा गंभीर होती है। यह एक रहस्य ही है।

क्यों भक्त माता को सप्तश्रृंगी पुकारते हैं ?

आपको बता दें कि यह मंदिर सात पर्वतों से घिरा हुआ है। ऐसी मान्यता है कि ये सात पर्वत देवी मां का श्रृंगार करते हैं, इसलिए इस मंदिर का नाम सप्तश्रृंगी पड़ा। मुख्य मंदिर तक पहुंचने के लिए आपको 472 सीढियां चढ़नी पड़ेगी। मंदिर में माता की प्रतिमा आठ फुट ऊंची है और उनकी 18 भुजाएं हैं, जिनमें उन्होंने अलग-अलग अस्त्र-शस्त्र पकड़े हुई हैं।

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पौराणिक कथा

कहा जाता है कि जब महिषासुर राक्षस का आंतक भू लोक पर बढ़ गया था, तब देवताओं ने मां दुर्गा का आह्वान किया था, और महिषासुर का अंत करने के लिए  उनके 18 हाथों में अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र दिये थे।  भगवान शंकर ने त्रिशुल, विष्णु जी ने चक्र, वरुण देवता ने शंख, अग्निदेव ने दाहकत्व, वायुदेव ने धनुष-बाण, इंद्र देव ने वज्र, हिमालय ने सिंह वाहन दिया था। सप्तश्रृंगी मंदिर के पास ही एक छोटा मंदिर बना हुआ है, जिसे महिषासुर मंदिर कहा जाता है।

ऐसी मान्यता है कि देवी ने इसी स्थान पर महिषासुर का मर्दन किया था। उसके बाद से ही माता को महिषासुरमर्दिनी के नाम से पूजा जाता है। धार्मिक मान्यतानुसार, भगवान राम और सीता माता अपने वनवास के समय माता के दर्शन हेतु यहां पधारे थें।

मान्यता- संतान प्राप्ति की मनोकाना होती है पूर्ण  

ऐसी मान्यता है कि यहां निसंतान दंपत्तियों की मनोकामना पूर्ण होती है. नवरात्र के समय, माता की गोदभराई की जाती है। गोद भरने के लिए भक्त नारियल, चुनरी, साड़ी, चूड़ी, सिंदूर, और फल-फूल का उपयोग करते हैं। कहा जाता है कि मां अपने भक्तों को सभी 18 हाथों से आशिष देती हैं। इस मंदिर में नवरात्री के समय भारी भीड़ उमड़ती है और भक्तों के बीच महाराष्ट्र का स्वादिष्ट व्यंजन पूरन पोली का प्रसाद बांटा जाता है।

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