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जानिए कैसे बनी दीपा नामक बालिका, दीपेश्वरी मां और क्या है पौराणिक मान्यता

Dipeshwari Mataji
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मां दीपेश्वरी वह देवी है जिनके चर्चे चारों दिशाओं में फैले हुए हैं। दीये के समान उनकी कृपा दृष्टि का प्रकाश फैला हुआ है। शक्ति स्वरुपा के दर्शन के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं जिन्हें सभी धर्मों के लोगों की आस्था का प्रतीक माना जाता है, ऐसी भक्तों की आस्था का केंद्र बनी हुई माँ दीपेश्वरी अरावली के बायडत हसील के ऊँटरडा गाँव में नदी किनारे विराजमान होकर सभी के दुखों को हरती है।

पौराणिक मान्यता अनुसार ऊँटरडा गाँव के एक ब्राह्मण परिवार में दीपा नामकी लड़की का जन्म हुआ था। दीपा जन्म से तेजस्वी थी। एक बार माजूम नदी के किनारे बच्चे पेड़ की डाल पर झूले का आनंद ले रहे थे। दीपा भी खेलने के लिए पेड़ पर चढ़ी। अचानक से पेड़ की डाली टूटी और दीपा स्वर्ग से आई अप्सरा के समान नीचे उतरी। दीपा का शरीर फूलों से ढँक गया और अचानक से अदृश्य हो गई। अदृश्य होते ही बिजली चमकने लगी, माजूम नदी दोनों किनारों से बहने लगी।

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घटना को देखकर खेल रहे बच्चों ने दीपा के माता-पिता को पूरी घटना सुनाई। माता-पिता सुनकर आश्चर्य चकित हो गए। यह बात समग्र गाँव में फैल गई। सभी पेड़ के नीचे इकट्ठे हुए तभी एक आवाज सुनाई दी। दीपा का जन्म एक दिव्यशक्ति के रूप में हुआ था, इसलिए उसने आप सभी के बीच से विदाई ली है। दीपा के सिर्फ नाम स्मरण से ही आपके सभी के दुख दूर होंगें। गाँव-वासियों के कुल का दीपा, उद्धार करेगी। उसी क्षण फूलों के ढ़ेरों के बीच तेज ज्वाला प्रकट हुई। उसी दौरान गाँव-वासियों ने वहाँ ज्योति जलाकर पूजा अर्चना की और मंदिर का निर्माण करवाया। उस दिन से दीपा की पूजा दीपेश्वरी माँ के नाम से की जाने लगी।

दर्शनार्थियों की भेंट से मंदिर का नवनिर्माण किया गया। दीपेश्वरी माँ के मंदिर में भव्य प्रवेशद्वार का निर्माण किया गया है। परिसर में प्राचीन विशाल वृक्ष मंदिर की शोभा बढ़ाता है। मुख्य द्वार पर एक सुंदर मूर्ति स्थापित की गई है जिसमें नदी के किनारे दीपेश्वरी माँ झूला झूलते नजर आती हैं। माँ की मूर्ति के पास सदियों से अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित हो रही है। मंदिर के गुंबद पर माँ की सुंदर कलाकृति देखने को मिलती है।

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माँ के दर्शन के लिए हर रविवार और मंगलवार भक्तों की भीड़ उमड़ती हैं। चैत्र महीने में और वैशाख महीने की शुक्ल पक्ष की छठ के दिन मंदिर में माँ की मूर्ति के दर्शन का अधिक महत्व है। ऐसा कहा जाता है कि यह तिथि माता की प्रागट्य तिथि है। इस दिन भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। यहाँ दर्शनार्थियों की सभी सुविधाओं को ध्यान में रखा गया है। मंदिर परिसर में अन्नक्षेत्र और धर्मशाला की व्यवस्था भी की गई है। यहाँ आने वाले सभी भक्तों की मान्यताएँ अवश्य पूर्ण होती हैं।

भक्तों की मान्यता है कि जिनके घर में बालिकाएँ नहीं होती दीपेश्वरी माँ उनकी सभी इच्छाएँ पूरी करती हैं। मन्नतें पूरी होने पर सभी भक्त चाँदी के छत्र चढ़ाते हैं। माँ सभी पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखती हैं। मंदिर नदी के किनारे स्थित होने के कारण भक्त जन आस-पास के वातावरण का भी लुफ्त उठाते हैं। माँ की कृपा से यहाँ आने वाले सभी भक्तों की चिंताएँ दूर होती हैं।

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