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मान्यता है कि श्रीलंका के इस शक्तिपीठ की स्थापना रावण ने की थी

Shankari Devi Shaktipeeth
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भारत में देवी देवताओं के कई चमत्कारिक मंदिर है, जहां दर्शन के लिए  दूर-दूर से भक्त आते है। हर एक धार्मिक स्थल का अपना खास महत्व है। आज हम आपको ऐसे ही एक चमत्कारिक मंदिर के बारे में बताएंगे, जो मां के 51 शक्तिपीठों में से एक है। हम बात कर रहे है श्रीलंका के शंकरी देवी शक्तिपीठ की। माता का ये मंदिर श्रीलंका के कोलंबों से करीब 250 किलोमीटर दूर त्रिकोणमाली नामक स्थान पर स्थित है।

यहां की खास बात ये है कि यहां आनेवाले भक्त इस स्थान को शांति का स्वर्ग कहते है। माता का ये स्थान खास कर के तमिलभाषी हिंदूओं के आस्था का प्रमुख केन्द्र है। पौराणिक मान्यता है कि इस स्थान पर माता सती के शरीर का उसंधि यानि की पेट और जांघ के बीच का हिस्सा गिरा था, यही वजह है इस स्थान को शक्तिपीठ माना जाता है। कुछ धार्मिक ग्रंथों की माने तो यहां पर देवी सती के कंठ का नुपूर गिरने का उल्लेख भी मिलता है।

देखें ये वीडियो: मान्यता है कि श्रीलंका के इस शक्तिपीठ की स्थापना रावण ने की थी

रावण ने की शक्तिपीठ की स्थापना !

मान्यता है कि शंकरी देवी मंदिर की स्थापना खुद रावण ने की थी। यहां शिव का मंदिर भी है, जिन्हें त्रिकोणेश्वर या कोणेश्वरम कहा जाता है। मंदिर की खास बात ये है कि यहां अक्सर माता के दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ दिखाई देती है। तंत्रचूड़ामणि में लगभग 52 शक्ति पीठों के बारे में बताया गया है। यहां की शंकरी देवी शक्तिपीठ इन्ही में से एक है। यहाँ की सती ‘इंद्राक्षी’ तथा शिव ‘राक्षसेश्वर’ हैं।

क्या है शक्तिपीठ?

हिंदू धर्म की मान्यताओं के मुताबिक जहां-जहां भी भगवान शिव की पत्नी सती के मृत शरीर के हिस्से या आभूषण गिरे, उन जगहों पर शक्तिपीठ बना। ये शक्तिपीठ केवल देश ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देशों में भी हैं। देवी पुराण में जिन 51 शक्तिपीठों का जिक्र है, उनमें से एक या दो नहीं बल्कि 8 शक्तिपीठ विदेशों में है।

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आदि शंकराचार्य के 18 महाशक्तिपीठों में से एक यह स्थान

इस जगह का उल्लेख आदि शंकराचार्य द्वारा निश्चित 18 महा-शक्तिपीठों में भी किया गया है। इतिहास में इस मंदिर पर कई बार हमले हुए, जिनसे मंदिर का स्वरूप बदलता रहा, लेकिन प्रतिमा को हर बार बचा लिया गया। चोल और पल्लव राजाओं ने इस मंदिर में काफी काम कराया।

दरअसल, इस भव्य मंदिर को 17वीं शताब्दी में पुर्तगाली आक्रमणकारियों ने ध्वस्त कर दिया था, जिसके बाद मंदिर के एकमात्र स्तंभ के अलावा यहां कुछ भी नहीं था। स्थानीय लोगों के मुताबिक, दक्षिण भारत के तमिल चोल राजा कुलाकोट्टन ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया, तो 1952 में श्रीलंका में रहने वाले तमिल हिंदुओं ने इसे वर्तमान स्वरूप दिया। यह मंदिर त्रिकोणमाली जिले की 1 लाख हिंदू आबादी की आस्था का भी केंद्र है।

दोनों ही नवरात्र पर यहां कई विशेष आयोजन होते हैं, जिसमें श्रीलंका के अलावा भारत (खासकर तमिलनाडु) से श्रद्धालु भी आते हैं। नवरात्रि में यहां पहुंचने वालों की संख्या रोजाना 500 से 1000 के बीच है, लेकिन अष्टमी और नवमी पर भीड़ बढ़ जाती है।

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