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एक शक्तिपीठ ऐसा भी जहां है मां के तीनों रूपों की एक ही प्रतिमा

Kanchi Kamakshi Temple
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ये एक ऐसा शक्तिपीठ है, जहां मां के तीनों रूपों की पूजा एक ही प्रतिमा से की जाती है। जी हां, मां के तीन रूप लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा तीनों का वास इस एक प्रतिमा में है। यह जीवंत मूर्ति है कामाक्षी माता की। यहां मां कामाक्षी के एक आंख में धन की देवी  लक्ष्मी और दूसरे में विद्या की देवी सरस्वती का वास बताया जाता है। देवी मां का यह अद्भूत रूप स्थित है तमिलनाडु के कांचीपुरम में। यह स्थान है श्री कांची कामाक्षी मंदिर। इस मंदिर को कामाक्षी अम्मा मंदिर भी कहा जाता है।  ऐसी मान्याता है कि मां कामाक्षी का ये मंदिर अनादि काल से है। भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है मां कामाक्षी देवी का मंदिर। जब रौद्र रूप में भगवान शिव ने देवी सती का शरीर उठाकर तांडव किया था, तब माता सती की नाभि यहां गिरी थी। इसलिए इस जगह को पूरे धरती का नाभिस्थान भी माना जाता है।

पौराणिक कथा

ऐसी मान्यता है कि अयोध्या के राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति हेतु माता कामाक्षी की पूजा की थी. पुराणों के अनुसार राजा दशरथ, महर्षि वशिष्ठ के कहने पर माता के दर्शन करने आए थे और पूरे विधिविधान से माता की पूजा अर्चना की थी। पूजा के दौरान ही मंदिर में मौजूद 24 खंभो में से एक से आवाज आई  कि उन्हें एक वर्ष के भीतर संतान की प्राप्ति होगी। आज भी इस खंभे की पूजा निसंतान दंपत्तियों द्वारा की जाती है।

देखें ये वीडियो: एक शक्तिपीठ ऐसा भी जहां है मां के तीनों रूपों की एक ही प्रतिमा

मां कामाक्षी को प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है सिंदूर

कहते हैं भगवान विष्णु, एक बार माता लक्ष्मी से कुपित हो गए थें, जिसकी वजह से उन्होंने माता को करूप होने का शाप दे दिया। शाप से मुक्ति पाने के लिए मां लक्ष्मी ने कामाक्षी देवी की पूजा की। मां कामाक्षी ने कहा था कि अब वो लक्ष्मी के साथ इस जगह पर विराजेंगी। साथ ही जो प्रसाद उन्हें चढ़ाया जाएगा, उससे लक्ष्मी मां की भी पूजा होगी। यहीं कारण है कि मां कामाक्षी को प्रसाद में जो सिंदूर चढ़ता है, वो मां लक्ष्मी को भी चढ़ाया जाता है।

कामाक्षी का अर्थ 

जैसा कि हमने आपको बताया कि यहां मां के तीनों रूपों की पूजा एक ही प्रतिमा के माध्यम से की जाती है. ऐसी मान्यता है कि कामाक्षी शब्द में ‘का’ का अर्थ है सरस्वती, ‘मा’ अर्थात लक्ष्मी और ‘अक्ष’ यानि चक्षु या आंखे, इसका मतलब है वो देवी, जिनकी चक्षु सरस्वती और लक्ष्मी हैं।

पौराणिक मान्यता

कहा जाता है कि दैत्य भंडासुर का संहार करने के लिए मां दुर्गा ने कन्या का रूप लिया था और  वे इसी जगह आकर बैठ गई थी, इसलिए मंदिर की प्रतिमा को स्वंयभू माना जाता है। जिसका सीधा अर्थ है मूर्ति को किसी ने बनाया नहीं है, बल्कि ये स्वयं अवतरित हुई थीं।

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मंदिर में है आदिगुरू शंकराचार्य का श्रीचक्रम

श्री कांची कामाक्षी मंदिर में ही आदिगुरू शंकराचार् द्वारा स्थापित श्रीचक्रम स्थित है। यह मां कामाक्षी की मूल प्रतिमा के ठीक सामने स्थित है। कहा जाता है कि यह पूजा अर्चना की तांत्रिक विधि है।

भक्तों के बीच है गहरी आस्था

कहा जाता है कि माता के पास एक हज़ार करोड़ रूपये से अधिक के गहने हैं। यह सब भक्तों द्वारा चढ़ावे में मिला है। मां के श्रंगार में प्रयोग होने वाली मालाएं भी केसर, बादाम, काजू, कमल, चमेली, ऑर्किड, गुलाब से बनी होती हैं। इनका वजन 20 किलो के आस-पास होता है और कीमत पांच लाख रूपए से अधिक होती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोगों की मां के प्रति कितनी गहरी आस्था है।

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