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क्यों खतरे में उत्तर प्रदेश का राज्य पक्षी

sarus crane
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(suras crane) सारस क्रेन भारतीय उपमहाद्वीप, दक्षिणपूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में पाया जाने वाला एक बड़ा गैर-प्रवासी क्रेन है. यह उड़ने वाले पक्षियों में सबसे बड़ा पक्षी है. और इसकी लंबाई 1.8 मीटर(5.9 फ़ीट) हो सकती है. इसके पंख 2.4 मीटर यानी 8 फीट तक चौड़े होते है. और इसका वजन 8.4 किलो तकरीबन 18.5 पाउंड तक हो सकता है. यह खुले और गीले मैदान पर रहना पसंद करते हैं.

साथ ही वे अपने समग्र ग्रे रंग और विपरीत लाल सिर और ऊपरी गर्दन की वजह से दुसरी क्रेनों से भिन्न दिखते हैं. ज्यादातर जड़ें, कंद, कीड़े, और छोटे Vertebrate का भोजन करते हैं. ये लंबे समय तक साथ रहते हैं.  सारस क्रेन नोर्थन और सेन्ट्रल इंडिया, साउथइस्टर्न पाकिस्तान,म्यानमार,कंबोडिया, वियेतनाम जैसे देश में देखने को मिलते है.

sarus crane

Image-Ebird

कैसे आवासों में रहना पसंद करते है सारस क्रेन 

आर्द्रभूमि, मौसम पानी भरे हुए जलस्त्रोत्र, पानी भरे हुए सवाना लैंड. मानव निर्मित क्षेत्र जैसे नहरें, सिंचाई की केनाल और खेत शामिल हैं. माना जाता है की भारत और ओस्ट्रेलिया में मिलने वाले सारस क्रेन(suras crane) पक्षी माइग्रेट नहीं करते जब कि साउथईस्ट एशिया के सारस(suras crane) माइग्रेट करते है. मेटिग के बाद (suras crane) सारस क्रेन 2 से 3 अंड़े देते है. 31 से 34 दिनों के बाद अंड़े में से बच्चे निकलते है. यह बच्चे 85 से 100 दिनों के भीतर उड़ने लगते है.

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भारतीय मोर के करीबी दावेदार होने के नाते इन्हें भारत में सम्मानित किया गया है. इन्हें कुछ जनजातियों द्वारा पवित्र माना जाता है. क्योंकि जाहिर तौर पर ये जीवन भर के लिए एक साथ रहते हैं. यदि दोनों मे से कोई एक मर जाता है, तो दुसरा खुद को बिन कुछ खाए मोत कि ओर धकेल देता है, इस वजह से ही इन्हें वैवाहिक गुण का प्रतीक माना जाता है.

sarus crane

Image-vajiramias

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उत्तर प्रदेश राज्य का यह पक्षी विलुप्त होने की कगार पे हैं. जिसका मुख्य कारण किसानों द्वारा गीली भूमि को निकाल और कृषि के लिए भूमि का रूपांतरण कर उनके आवास को नष्ट करना है. राजमार्गों, आवास उपनिवेशों, सड़कों और रेलवे लाइनों के निर्माण भी एक मुख्य कारण हैं. क्योंकि बिजली लाइनों के साथ टकराव के कारण कई मौतें दर्ज की गई हैं. भारत में सारस क्रेन संरक्षण परियोजना टीम द्वारा विभिन्न गतिविधियों का उपयोग किया जा रहा है. अन्यत्र, वहीं यह प्रजातियां पूर्वी सीमा के कई हिस्सों में समाप्त कर हो गयी हैं.

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