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स्वामी नारायण संप्रदाय के संत श्री गोपालानंद स्वामी की पवित्र भूमि ‘टोरडा धाम’

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सदगुरू श्री गोपालानंद स्वामी का नाम सुनते ही स्वामी नारायण संप्रदाय के सारे हरिभक्त बहोत आनंदित हो जाते है। उत्तर गुजरात के साबरकांठा जिले के भिलोडा तहेशिल मे स्थित टोरडा गांव उनकी जन्मभूमि है। पवित्र पावन भूमि टोरडा मे श्री नरनारायण देव का स्वामिनारायण भगवान का शिखर वाला मंदिर है। यहां सदगुरू श्री गोपालानंद स्वामी, उनके माताजी जीवी बा और उनके पिताजी मोतीराम भट्ट रोज सेवा पूजा करते थे। कैसे एक ब्राह्मण पुत्र संत श्री गोपालानंद स्वामी बना और टोरडा धाम का धार्मिक महत्व क्या है.. आइये जानते है।

Shri Gopalanand Swami

18 वी सदी मे लोगो को आध्यात्मिक मार्ग पर लाने के लिये सहजानंद स्वामी का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने और उनके साथ जुडे 3 हजार संतोने बहोत कम समय मे हर गांव मे विचरण किया था। ये जो काम शुरू किया गया था उसमे सहजानंद स्वामी के बाद दुसरा सबसे महत्वपूर्ण योगदान गोपालानंद स्वामी का था। स्वामीनारायण भगवानने उन्हें पूरे स्वामीनारायण संप्रदाय का सुकानी बनाया था। संवंत 1837 की महा मास की शुक्ल अष्टमी और सोमवार के दिन गोपालानंद स्वामी का प्रागट्य हुआ था। उनके बचपन का नाम खुशाल भट्ट था। छोटी उम्र मे उन्होंने चार वेद, शास्त्र और पुराण का अभ्यास कर लिया था। हर प्रकार के शास्त्र मे वे पारंगत बन गये थे। छोटी उम्र मे उन्होंने अपना जीवन सामाजिक कार्य और स्वामी नारायण भगवान के चरणो मे समर्पित कर दिया था। संवंत 1864 के कार्तिक माह की कृष्ण अष्टमी को स्वामीनारायण भगवान ने गोपोलानंद स्वामी को दिक्षा दी थी और उन्है गोपालानंद स्वामी नाम दिया था। उनके जन्मस्थान टोरडा मे ये सुंदर मंदिर बना हुआ है। यहा गोपोलानंद स्वामी के दर्शन करने और मन की शांति और आनंद के लिये कई हरिभक्त आते है। इस मंदिर से थोडी दूरी पर गोपालानंद स्वामी का प्रागट्य स्थल है। इस स्थान को अदभूत स्तंभो के सजाया गया है। श्री गोपाल लालजी हरिकृष्ण महाराज की प्राण प्रतिष्ठा संवंत 2002 की वैशाख शुक्ल तीज यानी की अक्षय तृतिया 14 मे 1945 के दिन अहमदाबाद के श्री नरनारायण देव के आचार्य महाराज श्री देवेन्द्रप्रसादजी और वडताल के लक्ष्मी नारायण देव के आचार्य महाराज श्री आनंदप्रसादजी दोनो आचार्योने की थी। इसके पास सदगुरू गोपालानंद स्वामी, श्री गणपति और श्री हनुमानजी विराजित है।

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स्वामीनारायण भगवान का जन्म छपैया मे हुआ तब सदगुरू गोपालानंद स्वामीने सभामंडप के मंदिर मे विराजित श्री गोपाल लालजी हरिकृष्ण महाराज की मूर्ति के आगे भगवान के जन्म की खुशी मे गुड बांटा था इसी कारण से यहा गुड की बाधा रखी जाती है। सदगूरू गोपालानंद स्वामी सभी मुमुक्षुओ की मनोकामना पूरी करते है और सब को सुख प्रदान करते है।

Shri Swaminarayan Bhagwan

टोरडा मंदिर से कुछ दुरी पर शामलाजी मंदिर आया हुआ है। उनके साथ भी एक कथा जुडी हुई है की गोपालानंद स्वामी छोटे थे तब भगवान श्री कृष्ण खुद खुशाल भट्ट के साथ खेलने आया करते थे। एक बार शामलाजी मंदिर के द्वार पूजारीने जल्दी खोल दिये। भगवान श्री कृष्ण खेलते खेलते एक दम से भागे तब उनकी झांझर और कामली टोरडा मे रहे गये। यहा शामलाजी मंदिरमे भगवान की मूर्ति पर एक झांझर और कामली दिखे नही तब लोग पूजारी पर दोषारोपण करने लगे। भगवान से ये सहा नही गया तब वो खुद बोले की मेरा झांझर और कामली टोरडा रहे गये है। बाद मे खुशाल भट्ट के माता जीवी बा से वो मीले। शामलाजी मंदिर की खाताबही मे ये किस्सा है। तो एसे भगवान खुद गोपालानंद स्वामी के साथ खेलने आते थे।

Shri Sarangpur Hanumanji

सारंगपुर हनुमान मंदिर मे लोगो को अपार श्रध्धा है। क्या आपको पता है यह मंदिर मे जो हनुमानजी की मूर्ति है वो भी गोपालानंद स्वामीने बनवाई है। एक बार गोपालानंद स्वामी विचरण करते करते बोटाद पहोंचे। तब सारंगपुर के दरबार उनके दर्शन करने पहोंचे और बताया की उनके गांव मे 3 साल से बारिश नही हुइ और गांव की स्थिति आर्थिक रूप से अच्छी नही है इसलिये यहा कोई संत भी सत्संग के लिये नही आते। गोपालानंद स्वामीने दरबार को एक पत्थर लाने के लिये कहा और उस पर हनुमानजी की एक छबि बनाइ। फिर उस छबि के जैसी ही मूर्ति बनाने के लिये एक शिल्पकार को बोला। और वो कष्टभंजन देव की मूर्ति की स्थापना सारंगपुर मे कराई गइ। स्थापना के बाद आरती के समय गोपालानंद स्वामी एक नजर से मूर्ति की तरफ देखते रहे तब मूर्ति भी हिलने लगी। लोग आश्चर्य चकित हो गये और गोपालानंद स्वामीने भगवान साक्षात वहां है वैसी प्रतिति करवाइ। लोग पूरी श्रध्धा से हनुमानजी की भक्ति करने लगे और उनके सारे दुख दर्द दूर होने लगे।

जिनका नाम स्वामी नारायण भगवान के साथ लिया जाता है और स्वामी नारायण संप्रदाय मे जिनका सविशेष महत्व है वैसे गोपालानंद स्वामी की जन्मभूमि टोरडा और यहा का मंदिर बहोत पवित्र है। जहां दर्शन करके भक्त शांति और सुख का अनुभव करते है।

 

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