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Homeट्रैवेलSwargaRohini: इस जगह से है स्वर्ग का रास्ता, पांडवों ने सशरीर की थी यात्रा

SwargaRohini: इस जगह से है स्वर्ग का रास्ता, पांडवों ने सशरीर की थी यात्रा

swargarohini
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मौत से पहले कहा जाता है कि आपके मरने के बाद आपको या स्वर्ग मिलेगा या नरक. लेकिन भारत में एक स्थान ऐसा है जहां से आप मरने से पहले स्वर्ग जा सकते हैं. कहा जाता है कि यहीं से द्वापरयुग में पांडवों और द्रौपदी ने राजपाट त्याग देने के बाद सशरीर स्वर्ग की यात्रा शुरू की थी. ये जगह है उत्तराखंड में बद्रीनाथ के पास मौजूद स्वर्गरोहिणी. यह समुद्रतल से 15 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है. कहा तो ये भी जाता है कि सशरीर स्वर्ग की इस यात्रा में ज्येष्ठ  पांडव धर्मराज युधिष्ठिर ही कामयाब हो पाए थे. उनके दूसरे भाइयों और द्रौपदी ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया था.

पुष्पक विमान के जरिए गए थे स्वर्ग

धर्मराज और युधिष्ठिर के साथ एक श्वान का साथ होने की वजह से वे अंत तक इस स्थान की यात्रा कर पाए. इसके बाद युधिष्ठिर के साथ श्वान ने ही पुष्पक विमान के जरिए स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया था. स्वर्गरोहिणी जैसा कि नाम से ही साफ समझ आता है कि स्वर्ग की ओर ले जाने वाली जगह. ये जगह इतनी खूबसूरत है कि अगर आप एक बार यहां चले जाएंगे तो यहां से आपको लौटने का मन नहीं करेगा. ये जगह पूरी तरह से बर्फ से ढंकी रहती है. यहां आने के लिए मई से अक्टूबर का समय एकदम परफेक्ट है. इस जगह को लेकर मान्यता है कि यहां आज भी इंसानों के साथ के लिए श्वान आते है लेकिन ये कहां से आते हैं और कहां से चले जाते हैं आजतक इसका कोई पता नहीं लगा सका है. 

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लेकिन यहां जाकर जितना सुकून आपको मिलेगा उससे कही ज्यादा आप रास्ते में कठिनाइयों का सामना करेंगे. बद्रीनाथ से ये जगह 28 किलोमीटर दूर है और ये कई मुश्किलों पड़ावों से होकर निकलती है. बद्रीनाथ से माणा गांव तक 3 किलोमीटर का सफर आप वाहन से कर सकते हैं लेकिन आगे के 25 किलोमीटर की यात्रा आपको पैदल ही करनी होगी. यहां जाने के लिए आपको विशाल जंगल लक्ष्मीवन पार करना होगा. लक्ष्मीवन को लेकर मान्यता है कि भगवान नारायण की तपस्या के समय माता लक्ष्मी को बेर का पेड़ बनकर छांव करने पर इसी वन में ही रहने का वारदान मिला था. इसके बाद आप यहां सहस्रधारा और चक्रतीर्थ में जाकर सुकून पा सकते हैं और आखिरी पड़ाव में सतोपंथ झील मिलती है.

सतोपंथ झील को लेकर माना जाता है कि यहां पाडवों ने स्वर्ग की यात्रआ करने से पहले स्नान किया था और यहीं से अलकनंदा नदी निकलती है. इस झील की परिक्रमा करना भी काफी पुण्य का काम माना जाता है. इस पूरी यात्रा में आपको 3 से 4 दिन का समय लेगा. इस यात्रा के दौरान आप गुफाओं में आराम कर सकते हैं लेकिन आपको अपने साथ खाने-पीने का सामान खुद ले जाना होगा.

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