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UAE में बन रहा है पहला हिंदू मंदिर, भारत के कारीगर कर रहे हैं तैयार

UAE
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किसी मुस्लिम देश में पहली बार कोई हिंदू मंदिर बनने जा रहा है. ये मुस्लिम देश कोई और नहीं बल्कि संयुक्त अरब अमीरात यानि यूएई है. यूएई की राजधानी अबू धाबी की धरती पर बन रहा ये मंदिर उत्तर प्रदेश के अयोध्या में बन रहे राम मंदिर की ही तरह तैयार किया जा रहा है. ये मंदिर अपने आप में ही एक अलग इतिहास की कहानी बयां करता है. आबू धाबी में बन रहा ये बीएपीएस मंदिर हिंदू आर्किटेक्चर के नागराधि स्टाइल का प्रतिनिधित्व करता है. इसके अलावा ये पत्थरों से बनने जा रहा यूएई का बीएपीएस पहला मंदिर होगा.  

हजारों सालों तक खड़ा रहेगा मंदिर

मंदिर के निर्माण कार्य में लगे सदस्यों का दावा है कि ये मंदिर 1000 सालों तक मजबूती से ऐसे ही खड़ा रहेगा. साथ ही रिपोर्ट्स में ये भी दावा किया जा रहा है कि मंदिर का पहला चरण पूरा हो चुका है. इस प्रोजेक्ट के निर्माण में लगे सदस्यों ने खलीज टाइम्स से बातचीत में कहा कि मंदिर की नींव का काम पूरा हो चुका है. मंदिर के निर्माण के लिए भारत से कारीगरों को बुलाया गया है. इस मंदिर को लेकर मंदिर के प्रवक्ता और धर्मगुरु ब्रह्मविहारी स्वामी ने मंदिर निर्माण से जुड़ी कई जानकारियों को लेकर खुलासा किया है.

बलुआ पत्थर की बिछाई गई है मोटी परत

ब्रह्मविहारी स्वामी ने बताया कि अबू मुरेख में स्थित मंदिर की जमीन पर बलुआ पत्थर की मोटी परत बिछाई गई है. बलुआ पत्थर की ये मोटी परत बेहद सख्त और मजबूत है और इसकी खास बात ये है कि ये सतह के एक मीटर नीचे तक है. अब नींव का काम पूरा होने के बाद मंदिर को आकार नक्काशीदार पत्थर और मार्बल से दिया जाएगा. वहीं एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में तैयार किए गए पारंपरिक पत्थर के मंदिर की फाइनल डिजाइन और हाथ से नक्काशी किए गए पत्थरों के स्तंभ की तस्वीरें नवंबर में ही सामने आ गई थी.

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भारत में बीएपीएस मंदिर के लिए इन पत्थरों को गुजरात और राजस्थान के कारीगरों ने तैयार किया है. मंदिर पर हिंदू महाग्रंथों की तस्वीरें और कहानियां भी चित्रित की जाएंगी. एयर प्रोडक्ट्स के प्रिंसिपल सिविल इंजीनियर संदीप व्यास ने कहा शुरुआत में जमीन के तकनीकी सर्वेक्षण में एक 20 मीटर पत्थर मिला है जिसने सभी को हैरान कर दिया है.  

मंदिर के नींव के डिजाइन के बारे में बात करते हुए बीएपीएस प्लानिंग सेल के संजय ने बताया कि मंदिर को पूरी तरह से पत्थरों से बनाया जा रहा है. प्राचीन शास्त्रों के हिसाब से मंदिर के निर्माण में लौहे की धातु का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा. मंदिर को पूरी तरीके से डिजिटल रुप से डिजाइन किया गया है. वहीं मंदिर निर्माण स्थान के भूगर्भविज्ञान को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है.

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