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जानिए, सनातन धर्म की रक्षा करने वाले ‘पराक्रमी दुर्गादास राठौड़’ की वीरगाथा!

veer durgadas
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माई ऐहड़ौ पूत जण, जेहड़ौ दुर्गादास
मार गण्डासे थामियो, बिन थाम्बा आकास

Veer Durgadas Rathore (वीर दुर्गादास राठौड़) को आज भी उनकी वीरता, साहस और पराक्रम के लिए याद किया जाता है। मारवाड़ की धरती पर जन्में दुर्गादास ने मुग़लों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी थी और मातृभूमि से मुग़ल शासकों का पीछा छुड़वाने के लिए अहम भूमिका निभाई थी। वीर दुर्गादास को औरंगज़ेब के शासनकाल में महाराजा जसवंत सिंह द्वारा “मारवाड़ का भावी रक्षक” की उपाधि से सम्मानित किया गया था।  

दुर्गादास राठौड़ ही थे जिन्होंने औरंगजेब की पूर्ण इस्लामीकरण की साजिशों को विफल किया था। और सनातन धर्म की रक्षा की थी। 

पराक्रमी और वीर योद्धा वीर दुर्गादास का परिचय: 

वीर दुर्गादास राठौड़ का जन्म 13 अगस्त 1638 के दिन हुआ था। उनके पिता श्री आसकरण जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह की सेना में सेनापति थे। और माता नेतकँवर की छत्र-छाया में दुर्गादास का पालन-पोषण हुआ था। देश भक्ति और नेक कर्म के संस्कार उनमें बचपन से ही थे। जैसे जैसे बड़े होते गए उन्होंने पिता के पदचिन्हों पर चलना शुरू किया। युवा अवस्था में खेतों की रखवाली करना शुरू की। साथ ही शस्त्र विद्या का ज्ञान प्राप्त कर निपुण हुए।

Veer-Durgadas

(Veer Durgadas Rathore), image credit rajasthan tourism

युवा अवस्था से ही निर्भय और साहसी थे, 

बात उस समय की है जब महाराजा जसवंत के चरवाहे ऊँटों को चराते हुए दुर्गादास के खेतों में आ गए थे, फसलों को ख़राब होने से बचाने के लिए चरवाहों को खेत से ऊँटों को बाहर निकालने के लिए कहा। लेकिन चरवाहों ने बालक की बात को अनसुना किया इसलिए दुर्गदास ने दंड दिया। यह बात महाराजा तक पहुँच गई, राजा ने वीर बालक से मिलने की इच्छा व्यक्त करते हुए दरबार में बुलाने का आमंत्रण दिया।पराक्रमी युवा ने महाराज के दरबार पहुंच कर अपनी बात को निर्भयता से व्यक्त किया जसवंत सिंह काफी प्रभावित हुए। और उन्होंने दुर्गादास राठौड़ को एक कृपाण भेंट की। 

उसी दिन राजा को पता चला कि दुर्गादास  सेनापति आसकरण का बेटा है। तभी से Veer Durgadas Rathore  महाराज जसवंत सिंह के विश्वासपात्र व्यक्ति बन गए। 

इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने दुर्गादास राठौड़ के बारे में कहा है कि, “उनको न मुगलों का धन विचलित कर सका और न ही मुगलों की शक्ति उनके दृढ निश्चय को पीछे हटा सकी, बल्कि वो ऐसा वीर था जिसमें राजपूती साहस और कूटनीति मिश्रित थी”। 

दिल्ली के सम्राट औरंगजेब के ख़िलाफ़ लड़ी अंगरक्षक ने लड़ाई: 

उस समय दिल्ली पर औरंगजेब का शासन था, वह पूर्ण रूप से अजमेर पर अपना शासन स्थापित करना चाहता था। जसवंत सिंह जी औरंगजेब के सेनापति थे। औरंगजेब ने जसवंत सिंह की मृत्यु के लिए एक षड्यंत्र रचा और अफगानिस्तान में पठान विद्रोहियों से लड़ने के लिए भेज दिया। युद्ध पर महाराज जसवंत सिंह के साथ अंगरक्षक दुर्गादास राठौड़ भी गए थे। घमासान युद्ध के दौरान नवंबर 1678 में जसवंत सिंह की मृत्यु हो गई।  

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दुर्गादास ने अजीत सिंह को युवावस्था तक षड्यंत्र से बचाए,image credit: google image 

महाराजा का एक पुत्र था जिसका नाम अजीत सिंह था। वहीं औरंगजेब ने जोधपुर सियासत पर अपना आधिपत्य जमाने के लिए शाही हकीम को बैठा दिया। और अजीत सिंह को भी मारना चाहता था।क्योंकि वह नहीं चाहता था कि भविष्य में अजमेर का राजकुमार अजीत सिंह राजदरबार संभाले। वीर दुर्गादास औरंगजेब के षड्यंत्र से भलीभाँति परिचित थे। 

दुर्गादास ने अजीत सिंह को युवावस्था तक षड्यंत्र से बचाए रखा, 

इस तरह दुर्गादास राठौड़ (Veer Durgadas Rathore) ने अजीत सिंह को युवावस्था तक कई षड्यंत्र से बचाए रखा और अजीत सिंह को अजमेर का राजभार सौंप दिया। इस दौरान उन्होंने मारवाड़ के सामंतो के साथ मुगल सेनाओं पर छापामार हमले करना शुरू कर दिए। उन्होंने महाराजा राजसिंह और मराठों को भी अपने इस कार्य में जोड़ना चाहा परंतु वे उनके साथ नहीं जुड़े।

महाराजा अजीत सिंह दुर्गादास राठौड़ से घृणा करने लगे,

महाराजा अजीत सिंह के कुछ लोगों ने दुर्गादास के खिलाफ घृणा पैदा कराई। और अजीत सिंह वीर राठौड़ से नफ़रत करने लगे। यहाँ तक कि सिंह ने दुर्गादास की मृत्यु का षड्यंत्र भी रचा। परंतु अजीत सिंह उसमें असफल हो गए।इन कारणों से अपने जीवन के अंतिम दिनों में दुर्गादास राठौड़ को मारवाड़ की धरती से जाना पड़ा। शिप्रा नदी के किनारे अवंतिका नगरी चले गए।

durgadas stamps

(Veer Durgadas Rathore) के सिक्के और पोस्ट stamp, image credit: google image 

अवंतिका नगरी में वीर राजपूती साहस का निधन: 

अवंतिका नगरी में 22 नवंबर 1718 में दुर्गादास राठौड़ का निधन हो गया। उज्जैन में लाल पत्थर से आकर्षित statue बनाया गया है जिसे चक्रतीर्थ नामक स्थान से जाना जाता है। यह स्थान देश के सभी राजपूतो और देशभक्तों के लिए तीर्थ स्थान के समान है। वीर दुर्गादास राजपूती साहस, पराक्रमी और वफादारी की मिसाल है और एक उज्वल उदाहरण हैं।

भारत सरकार ने वीर दुर्गादास राठौड़ के सिक्के और पोस्ट stamp भी जारी किये थे। 

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