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Homeकहानियांकहानी उस NATO की जो रूस-यूक्रेन विवाद की वजह बन गया और अब तक सिर्फ ‘निंदा’ ही करता रहा है

कहानी उस NATO की जो रूस-यूक्रेन विवाद की वजह बन गया और अब तक सिर्फ ‘निंदा’ ही करता रहा है

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रूस के यूक्रेन पर हमले(Russia-Ukraine War) से पहले अमेरिका(America) और ब्रिटेन(Britain) समेत दुनिया के कई मुल्क जो खुद को सुपरपावर समझते हैं, उन्होंने रूस को खूब चेतावनी दी लेकिन रूस नहीं माना. आखिरकार उसने 24 फरवरी को यूक्रेन पर हमला बोल दिया और यूक्रेन के कई शहरों पर उसने धीरे-धीरे कब्जा जमाना शुरू कर दिया. जब कई तरफ से हमले हुए तो यूक्रेन(Ukriane) घबरा उठा, पहले तो उसने मोर्चा संभालने की कोशिश लेकिन बाद में वहां के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की(Volodimir Jelensaki) ने कहा कि हमें सबने अकेला छोड़ दिया है.

युद्ध में अकेला पड़ा यूक्रेन

युद्ध के पहले से ही नाटो(NATO) की अगुवाई करने वाला अमेरिका जो ये कह रहा था कि अगर रूस ने हमला किया तो नाटो देश उसे नहीं छोड़ेंगे, वह शांत बैठ गया. यहां तक कि युद्ध में सीधे तौर पर मदद करने की बजाय अमेरिका ने यूक्रेन के राष्ट्रपति को सुरक्षित वहां से निकालने के लिए विमान भेजे लेकिन उन्होंने ये कहते हुए साफ इनकार कर दिया कि हमें विमान नहीं, बल्कि बम, गोला-बारूद की जरूरत है.

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Image Courtesy: Google.com

नाटो से रूस के चिड़ने की वजह क्या है

यहीं से युद्ध ने अलग मोड़ ले लिया और बीते छह दिनों से दोनों देशों के बीच युद्ध जारी है. रूस इसे युद्ध की बजाय मिलिट्री ऑपरेशन कह रहा है तो वहीं यूक्रेन के राष्ट्रपति ने ये तक कह दिया है कि रूस उनकी हत्या करवाना चाहता है. अब इन सबके बीच एक सवाल सबके जेहन में ये उठ रहा है कि आखिर रूस नाटो से इतना चिड़ता क्यों(Why Does Russia Not Like Nato) है, आखिर ये 30 देशों वाला संगठन नाटो क्या है, अगर ये वाकई शक्तिशाली है तो फिर यूक्रेन को इसने अकेला क्यों छोड़ दिया. आइए इन सभी सवालों का जवाब जानने की कोशिश करते हैं.

नाटो या नेटो क्या है

सबसे पहले बात करते हैं कि आखिर नाटो क्या है(What is NATO). नाटो या नेटो का पूरा नाम नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन है. जिसे हिंदी में उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन(North Atlantic Treaty Organisation) कहते हैं, यह एक तरह का सैन्य संगठन है. जिसकी शुरुआती भारत की आजादी के दो साल बाद साल 1949 में हुई थी. इसकी शुरुआत की कहानी जानने से पहले इतना समझ लीजिए कि फिलहाल इसमें अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे 30 देश हैं. जब 1949 में इसकी स्थापना हुई तो इसमें 12 देश शामिल थे. बीते 73 सालों में नाटो में 18 अन्य देश शामिल हुए हैं, जिसमें यूक्रेन के पड़ोसी मुल्क भी शामिल हैं.

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कैसे हुआ नाटो का जन्म  

अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर नाटो जब इतने शक्तिशाली देशों का सैन्य संगठन है तो फिर रूस जैसा शक्तिशाली देश इससे चिड़ता क्यों है. इस सवाल का जवाब जानने के लिए आपको द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उस दौर को याद करना होगा जब सोवियत संघ अपना विस्तार करता जा रहा था. कहा जाता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जो भी यूरोपियन देश(European Countries) कमजोर हुए उन्हें रूस अपने साथ मिला लेना चाहता था लेकिन अमेरिका(America) को ये गंवारा नहीं था.

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इसी साम्राज्य विस्तार की नीति ने नाटो(NATO) को जन्म दिया. इस नाटो का अपना अलग नियम कानून है, जिसमें एक नियम ये भी है कि अगर इसके किसी भी सदस्य देश पर कोई अन्य देश हमला करता है तो उसे नाटो पर हमला माना जाएगा और फिर सब मिलकर इसकी लड़ाई लड़ेंगे.

सोवियत संघ की नजरों में खटकता था नाटो

उसी वक्त सोवियत संघ(Soviet Union) की नजरों में नाटो खटकने लगा. हालांकि साल 1991 में जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो रूस जो इसका नेतृत्व कर रहा था वह पहले की तुलना में वैश्विक स्तर पर कमजोर पड़ गया, इसके अलावा इससे 14 अन्य देश अलग हुए. सोवियत संघ के बनने और टूटने की कहानी के भी कई पहलू हैं.

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कैसे बना सोवियत संघ

साल 1917 में हुई रूसी क्रांति(Russian Revolution) के बाद जब रूसी साम्राज्य के जार यानि सम्राट को गद्दी से हटाया गया तो व्लादिमीर लेनिन की सरकार ने सत्ता हासिल कर ली लेकिन देश एक बार फिर गृहयुद्ध में फंस गया. साल 1929 में बोल्शेविकों ने पूरी तरह से जीत हासिल कर रूस, यूक्रेन, बेलारूस और कॉकस क्षेत्र को मिलाकर सोवियत संघ(Soviet Union) की स्थापना कर दी.

ये थी नाटो की नींव की असल वजह

अब सोवियत संघ जब बना तो कई सालों तक उस वक्त के शक्तिशाली देशों ने इसे मान्यता नहीं दी. पहले जर्मनी और और अमेरिका ने इसे मान्यता दी, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध(Second World War) के दौरान जर्मनी ने जब सोवियत संघ पर हमला बोला तो जवाब में सोवियत संघ ने बर्लिन तक कब्जा कर लिया था, इसमें जर्मनी की बुरी हार हुई थी. जिस मित्र राष्ट्र में सोवियत संघ अमेरिका और ब्रिटेन के साथ शामिल था, उसी अमेरिका को अब सोवियत संघ खटकने लगा, क्योंकि इसकी विस्तारवादी नीतियां उसे अच्छी नहीं लग रही थी.

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नाटो के जवाब में सोवियत संघ ने किया वारसा पैक्ट

यहीं से नाटों का जन्म हुआ. अमेरिका ने यूनाइटेड किंगडम, बेल्जियम, कनाडा, फ्रांस, डेनमार्क, आइसलैंड, नीदरलैंड,  पुर्तगाल, लग्जमबर्ग और नॉर्वे के साथ मिलकर एक ऐसा सैन्य संगठन बनाया जो सोवियतस संघ के बढ़ते प्रभाव से मुकाबला कर सके. यही वह समय था जब रूस और अमेरिका के बीच कोल्ड वॉर(Cold War) की शुरुआत हुई. दोनों शक्तिशाली देश अपना दबदबा कायम करना चाहते थे. नाटो के जवाब में सोवियत संघ ने साल 1955 में वारसा पैक्ट(Warsaw Pact) बनाया. जिसमें सोवियत संघ के अलावा पूर्वी जर्मनी, पोलैंड, हंगरी, रोमानिया, बुल्गारिया, अल्बानिया और चेकोस्लोवाकिया शामिल था.

सोवियत संघ के टूटने के बाद रूस ने की ऐसी कोशिश

हालांकि साल 1991 में वहां के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव(Mikhail Gorbachev) की उदारीकरण और लोकतांत्रिकरण ने सोवियत संघ को टूटने की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया. हालांकि कई इतिहासकार ऐसा भी मानते हैं कि तब सोवियत संघ की आर्थिक हालत भी ज्यादा अच्छी नहीं थी. मतलब सोवियत संघ के टूटने के कई कारण थे. जब ये टूटा तो रूस पहले की तुलना में कमजोर जरूर हुआ लेकिन उसने एक बार फिर अपनी मजबूती बनाने की कोशिश की.

नाटो को इस प्रोग्राम से जुड़ा था रूस

सोवियत संघ के टूटने के बाद रूस नाटो(NATO Programme) के पार्टनरशिप ऑफ पीस प्रोग्राम से जुड़ा, लेकिन साल 2014 में जब रूस ने क्रीमिया पर हमला किया तो नाटो ने उसके साथ सभी संबंध सस्पेंड कर दिए. ये वही साल 2014 था जब यूक्रेन को नाटो में शामिल होने की जरूरत महसूस हुई. यूक्रेन ने इसकी पहल की और वह नाटो से जुड़ना चाहता था लेकिन रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन(Vladimir Putin) को ये बात रास नहीं आई. पुतिन का कहना है कि यूक्रेन उससे लंबी सीमा साझा करता है, ऐसे में अगर नाटो में यूक्रेन शामिल हुआ तो उसकी सेनाएं रूस तक पहुंच जाएंगी, जिससे उसकी सुरक्षा को खतरा है. फिलहाल नाटो की हालत ये है कि उसने इसे अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है, और इसकी निंदा की है.

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नाटो की खास बातें

30 देशों का सैन्य गठबंधन नाटो कई देशों में सैन्य ऑपरेशन(Military Operation) चला चुका है. सभी देशों की सेनाओं को मिला दें तो इसके पास करीब 30 लाख से ज्यादा एक्टिव सैनिक हैं, जबकि इसका बजट 1174 अरब डॉलर है, जो कई देशों के रक्षा बजट से कई गुणा ज्यादा है. बेल्जियम के ब्रसेल्स में इसका मुख्यालय है तो वहीं कई देशों में अभी भी इसकी सेनाएं तैनात हैं. जिस यूक्रेन पर रूस ने हमला किया है उसके कई पड़ोसी मुल्कों में इसकी सेनाएं तैनात हैं. लेकिन चूंकि यूक्रेन नाटो(NATO) का अभी सदस्य नहीं है, इसलिए नाटो(NATO) सीधे तौर पर मदद से बच रहा है. अमेरिका ने भी ये साफ कर दिया है कि यूक्रेन को ये लड़ाई(Russia-Ukraine War Update) अकेले ही लड़नी होगी, हालांकि आर्थिक मदद और हथियारों की आपूर्ति पर कई देश राजी हुए हैं.

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