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रावण से पहले किसकी थी लंका क्या जानते हैं आप, ये पौराणिक कथाएं उठाती हैं इन रहस्यों से पर्दा

Golden Lanka
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त्रेतायुग में भगवान श्रीराम(Lord Shree Ram) के दूत हनुमान ने सोने की लंका(Golden Lanka) को जलाकर खाक कर दिया, लेकिन सहस्त्रों शताब्दी (हजारों साल) बीत जाने के बाद भी ये सवाल लोगों के मन में कायम है कि आखिर ये लंका(Lanka) रावण से पहले किसकी थी. जब आप रामचरितमानस पढ़ते हैं या भगवान राम से जुड़ा कोई प्रसंग पढ़ते हैं तो उसमें सीताहरण और रावण का जिक्र आता है. वहीं रावण जो खुद को लंकापति(LankaPati Ravana)कहलवाने में बड़ा गर्व महसूस करता था, क्योंकि लंका जैसी नगरी तीनों लोकों में कहीं नहीं थी. इस नगरी के निर्माण की कहानी भी काफी रोचक है.

ये हैं लंका के निर्माण के पीछे की पौराणिक कथाएं

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक आम तौर पर दो कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से एक ये कि भगवान शिव ने लंका(Lanka) बनवाई थी, जबकि दूसरी ये कि रावण से पहले ये लंका कुबेर(Kubera) की थी. ऐसे में बात सबसे पहले पहली कहानी की करते हैं. शास्त्रों में इस बात का उल्लेख है कि भगवान शिव औघड़दानी हैं, जिसका मतलब है कि अगर वह भक्त पर प्रसन्न हैं तो उसे कुछ भी दे सकते हैं. सोने की लंका(Golden Lanka) को लेकर भी कुछ ऐसा ही हुआ. जब माता पार्वती ने भगवान शिव से ये कहा कि सभी देवी-देवता स्वर्ग में रहते हैं, महलों में रहते हैं जबकि आप पहाड़ों और श्मशान में क्यों रहते हैं, आपको भी महल में रहना चाहिए, जिसे सुनकर देवाधिदेव महादेव ने कहा कि ऐसा संभव नहीं है.

Golden Lanka

Image Courtesy: Google.com

माता पार्वती के कहने पर भगवान विश्वकर्मा ने किया निर्माण

माता पार्वती अपनी जिद पर अड़ गईं और आखिरकार भगवान विश्वकर्मा(Lord Vishwakarma) को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई कि एक ऐसे महल का निर्माण करें, जिसमें सारी-सुख सुविधाएं हों और वैसे तीनों लोकों में कोई भी महल न हो. भगवान विश्वकर्मा ने सुमेरू पर्वत पर ऐसी जगह देखी जो चारों ओर समुद्र से घिरी थी और वहां का दृश्य काफी मनमोहक था. माता पार्वती के आदेश पर भगवान विश्वकर्मा ने वहां सोने की लंका बनवाई. अब चूंकि देवाधिदेव महादेव पहले ही कह चुके थे कि हम महलों में नहीं रह सकते तो हुआ भी ऐसा ही. जब शुभ मूहूर्त में गृह प्रवेश का वक्त आया, तो सभी ब्राह्मणों को भोजन करवाया गया, उसमें रावण के पिता ऋषि विश्रवा भी पहुंचे, जिन्होंने दान में भगवान शिव से लंका ही मांग ली और उसे धर्म-कर्म में निपुण अपने पुत्र कुबेर को दे दी. उसके बाद रावण ने हमला कर कुबेर से सोने की लंका छीन ली. उस वक्त माता पार्वती ने गुस्से में कहा कि भगवान शिव(Lord Shiva) के अंश से ही ये सोने की लंका जलकर खाक हो जाएगी और हुआ भी ऐसा ही त्रेतायुग में भगवान हनुमान ने सोने की लंका को जलाकर खाक कर दिया.

Hanuman

Image Courtesy: Google.com

ये है लंका के निर्माण की दूसरी कहानी

ये तो सोने की लंका(Golden Lanka) रावण की कैसे हुई उसकी पहली कहानी थी. जबकि दूसरी कहानी इससे अलग है. इसके मुताबिक जब भगवान शिव ने सोने की लंका बनवाई तो छल कर राक्षसों ने इसे हड़प लिया. माली और सुमाली नाम के दो दैत्यों ने इस पर कब्जा कर लिया. इनमें से सुमाली की पुत्री कैकसी रावण की मां थी. बाद में देवताओं ने युद्ध कर माली और सुमाली को पराजित किया और फिर सोने की लंका कुबेर को दे दी. कुबेर रावण के सौतेले भाई थे, लेकिन एक ओर रावण जहां विद्वान होने के बावजूद राक्षसी प्रवृत्तियों में लीन था तो वहीं कुबेर पूरी तरह से दैव प्रवृति के थे.

Golden Lanka

Image Courtesy: Google.com

रावण ने कुबेर से छिनी थी लंका

आज भी लोग कुबेर का खजाना जैसे कई उदाहरण देते हैं. कुबेर को सभी प्रकार के धन का स्वामी माना जाता है. कुबेर लंबे समय तक लंकापति बने रहे लेकिन जैसे ही रावण बड़ा हुआ उसे उसकी मां ने सारी बात बताई और फिर लंका पर वापस कब्जा करने की बात कही. माता के आदेश पर रावण ने देवताओं के आशीर्वाद और अपनी बल-बुद्धि की बदौलत लंका पर एक बार विजय प्राप्त कर ली.

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इस तरह लंका(Lanka) का निर्माण वास्तव में भगवान शिव ने ही किया था लेकिन उन्हें कभी लंकापति नहीं कहा गया बल्कि पहले कुबेर और फिर रावण लंकापति के रूप में जाने गए. हालांकि माता सीता के हरण के बाद भगवान राम ने जब रावण का वध किया तो सोने की लंका और उसके राजकाज को जिम्मा रावण के छोटे भाई विभीषण को भगवान राम ने सौंपा. जिसके बाद आखिरी वक्त में विभीषण को भी लंकापति के रूप में जाना गया.

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