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‘श्रीयंत्र’ या ‘श्रीचक्र’ क्यूँ है, समस्त ब्रह्मांड का प्रतीक?

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आज हम आपको रहस्यमयी श्री यंत्र की महिमा से अवगत करवाने जा रहे हैं। यह परम ब्रह्म स्वरूपिणी आदि प्रकृतिमयी देवी भगवती महात्रिपुर सुंदरी का आराधना स्थल है। यह चक्र ही उनका निवास एवं रथ है। श्रीयंत्र अलौकिक शक्ति व चमत्कारों से परिपूर्ण गुप्त शक्तियों का प्रजनन केन्द्र बिंदु कहा गया है। ‘श्रीयंत्र’ या ‘श्रीचक्र’समस्त ब्रह्मांड का प्रतीक है। यह त्रिगुणात्मिका महाविद्या, महालक्ष्मी, सहाशक्ति का एकात्म स्वरूप है।

“ शरणागत दीनार्त, परित्राण परायण

 सर्वस्यार्ति हरे देवी , नारायणी नमोस्तुते”

‘श्री’ अर्थात चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति

कलियुग में कामधेनु और कल्पवृक्षके समान यह यंत्र सुख, शांति, प्रतिष्ठा और समृद्धि प्रदान करने वाला कहा गया है, सभी प्रकार की ‘श्री’ अर्थात चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति देने के सामर्थ्य के कारण ही  इसे ‘श्रीयंत्र’ कहते हैं।जन्मकुंडली में मौजूद केमद्रुम, दरिद्र, शकट, ऋण, निर्भाग्य, काक आदि विभिन्न कुयोगों को दूर करने में श्री यंत्र अत्यंत लाभकारी है। इसकी कृपा से मनुष्य को अष्ट सिद्धि व नौ निधियों की प्राप्ति हो सकती है। भावपूर्ण उपासना से शारीरिक सबलता, निर्मलता, कांति और सौम्यता के साथ मानसिक और बौद्धिक विकास और आर्थिक संपन्नता अटल है।

ऋषि दत्तात्रेय व दुर्वासा ने श्रीयंत्र को मोक्षदाता माना है। जैन शास्त्रों ने भी इस यंत्र की प्रशंसा की है। जिस तरह शरीर व आत्मा एक दूसरे के पूरक हैं उसी तरह देवता व उनके यंत्र भी एक दूसरे के पूरक हैं। यंत्र को देवता का शरीर और मंत्र को आत्मा कहते हैं।जिस तरह मंत्र की शक्ति उसके शब्दों में निहित होती है उसी तरह यंत्र की शक्ति उसकी रेखाओं व बिंदुओं में होती है।

श्री यंत्र का रूप ज्योमितीय

श्री यंत्र का रूप ज्योमितीय होता है। इसकी संरचना में बिंदु, त्रिकोण , वृत्त, अष्टकमल का प्रयोग होता है।यह सात त्रिकोणों से निर्मित है। मध्य बिन्दु-त्रिकोण के चतुर्दिक् अष्ट कोण हैं। उसके बाद दस कोण तथा सबसे ऊपर चतुर्दश कोण से यह श्रीयंत्र निर्मित होता है।श्रीयंत्र के चतुर्दिक् तीन परिधियां खींची जाती हैं। ये अपने आप में तीन शक्तियों की प्रतीक हैं। इसके नीचे षोडश पद्मदल होते हैं तथा इन षोडश पद्मदल के भीतर अष्टदल का निर्माण होता है, जो कि अष्ट लक्ष्मी का परिचायक है। अष्टदल के भीतर चतुर्दश त्रिकोण निर्मित होते हैं, जो चतुर्दश शक्तियों के परिचायक हैं तथा इसके भीतर दस त्रिकोण स्पष्ट देखे जा सकते हैं, जो दस सम्पदा के प्रतीक हैं। दस त्रिकोण के भीतर अष्ट त्रिकोण निर्मित होते हैं, जो अष्ट देवियों के सूचक कहे गए हैं। इसके भीतर त्रिकोण होता है, जो लक्ष्मी का त्रिकोण माना जाता है। इस लक्ष्मी के त्रिकोण के भीतर एक बिन्दु निर्मित होता है, जो भगवती का सूचक है। साधक को इस बिन्दु पर स्वर्ण सिंहासनारूढ़ भगवती लक्ष्मी की कल्पना करनी चाहिए।

इस प्रकार से श्रीयंत्र 2816 शक्तियों अथवा देवियों का सूचक है और श्री यंत्र की पूजा इन सारी शक्तियों की समग्र पूजा है।

पौराणिक कथा

श्री यंत्र के संदर्भ में एक कथा का वर्णन मिलता है। उसके अनुसार एक बार आदि शंकराचार्यजी ने कैलाश मान सरोवर पर भगवान शंकर को कठिन तपस्या कर प्रसन्न कर दिया। भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर उनसे वर मांगने के लिए कहा। आदि शंकराचार्य ने विश्व कल्याण का उपाय पूछा। भगवान शंकर ने शंकराचार्य को साक्षात लक्ष्मी स्वरूप श्री यंत्र की महिमा बताई और कहा- यह श्री यंत्र मनुष्यों का सर्वथा कल्याण करेगा। श्री यंत्र परम ब्रह्म स्वरूपिणी आदि प्रकृतिमयी देवी भगवती महा त्रिपुर सुदंरी का आराधना स्थल है क्योंकि यह चक्र ही उनका निवास और रथ है। श्री यंत्र में देवी स्वयं मूर्तिवान होकर विराजती हैं इसीलिए श्री यंत्र विश्व का कल्याण करने वाला है। 

एक बार लक्ष्मी अप्रसन्न होकर बैकुण्ठ को चली गईं, इससे पृथ्वी तल पर काफी समस्याएं पैदा हो गईं। ऋषि वशिष्ठ ने निश्चय किया, कि मैं लक्ष्मी को प्रसन्न कर भूतल पर ले आऊंगा। उन्होंने विष्णु की आराधना से उन्हें प्रसन्न कर , उनके साथ ही महालक्ष्मी को मनाने गए लेकिन देवी की कृपा न मिली। आखिर देवताओं के गुरु बृहस्पति ने श्रीयंत्र साधना ’ का निश्चय किया। धातु पर श्रीयंत्र का निर्माण किया और उसे मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठायुक्त किया और दीपावली से दो दिन पूर्व धन त्रयोदशी को उस श्रीयंत्र को स्थापित कर विधि-विधान से उसका षोडशोपचार पूजन किया। पूजन समाप्त होते-होते लक्ष्मी स्वयं वहां उपस्थित हो गईं और बोलीं – मैं किसी भी स्थिति में यहां आने के लिए तैयार नहीं थीपरन्तु श्रीयंत्र मेरा आधार है और इसी में मेरी आत्मा निहित है।

श्री यंत्र का निर्माण सिद्ध मुहूर्त में ही किया जाता है। गुरुपुष्य योग, रविपुष्य योग, नवरात्रि, धन-त्रयोदशी, दीपावली, शिवरात्रि, अक्षय तृतीया आदि श्रीयंत्र निर्माण और स्थापन के श्रेष्ठ मुहूर्त हैं। शुभ अवसरों पर श्री यंत्र की पूजा का विधान है। 

श्रीयंत्र का मूल मंत्र:-

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः

संतान लक्ष्मी, व्यापार लक्ष्मी, धन लक्ष्मी, स्वास्थ्य लक्ष्मी, राज्य लक्ष्मी, वाहन लक्ष्मी, कीर्ति लक्ष्मी और आयु लक्ष्मी के साथ-साथ जीवन के अभाव, जीवन की दरिद्रता और जीवन के कष्ट दूर करने में इस प्रकार का श्रीयंत्र अपने आप में ही अनुकूलता और भव्यता प्रदान करता है। त्रिगुमात्म स्वरूप श्री यंत्र की कृपा आप सभी पर बनी रहे यही हमारी कामना है।

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